Friday, December 31, 2021

विदा 2021

साल 2021 को अगर 364 पन्नों की एक किताब मान लूँ तो ज़्यादातर पन्ने ख़ुशगवार, शानदार और अपनों के प्यार से महकते मालूम होते हैं। हिसाब-किताब अगर करना ही पड़े तो यही पाता हूँ कि तराजू के जिस ओर मेरा मन रखा है, वही पलड़ा भारी पड़ा है। यानी वही किया, जो मेरे मन  ने कहा। 

31 दिसंबर है आज, यानी साल का अंतिम दिन। फिलहाल अपने गाँव में हूँ। साल 2021 में लगभग दस महीने यहीं अपने गाँव ही रहा हूँ। जीवन में यह पहला मौका है कि गाँव को इतने करीब से देख-जान सका हूँ। यह साल इसलिए भी ख़ास बन जाता है। मैं मानता हूँ कि हम सबके भीतर एक गाँव बचा रहना चाहिए। गाँव के बचे रहने का मतलब है प्रकृति, परिवार और एक वैभवशाली विरासत में हमारी आस्था का बचे रहना। तुलसी के पौधे में अमृत और पीपल के पेड़ पर चुड़ैल का बचे रहना। जीवन में उत्सव और हमारे उत्सवों में उल्लास का बचे रहना।


..और शहर। शहर का मतलब है हमारे सपनों का विस्तार, शहर का मतलब है समय के साथ चलना। शहर का मतलब है जो आपको आत्म निर्भर और स्वाभिमानी बनाये। शहर का मतलब है ...मुंबई! 😊


साल 2021 पर लौटूं तो इसमें दर्द से भरा जनवरी भी है तो कलेजे को छलनी करता अप्रैल भी। लेकिन, लेकिन, लेकिन, मुझे संभालता दिसंबर अब मुझे अपनी बाँहों में ले चुका है। यहाँ जश्न मनाता नवंबर भी है तो इठलाता हुआ अगस्त और सितंबर भी। जून, जुलाई ने अबकी मुझे ज़्यादा जिम्मेदार बनाया है। अक्टूबर की बात करें तो इस बार  दशहरे में एक बार फिर से राम ने रावण को मार गिराया है। 

एक दिन मैं बाबूजी के पास बैठा कुछ- कुछ बतिया रहा था। मैंने उनसे पूछा कि - 'बाबूजी इतना लंबा संघर्ष रहा है आपका जीवन.. मैंने आपको कभी हताश, उदास या परेशान नहीं देखा कभी? क्या रहस्य है इसका?' बाबूजी ने बड़े गर्व से कहा कि- "जीवन में अगर अच्छे दोस्त हों तो सब कुछ आसान हो जाता है! " मैंने बाबूजी की ये बात गाँठ बांध ली है। 


साल के बीतने से पहले आप सभी दोस्तों को याद कर रहा हूँ। 

आपको याद कर रहा हूँ। और हाँ तुम्हें भी... सबका शुक्रिया, अभिनंदन और आभार। शेष मिलने पर ❤️

*आपका हीरेंद्र*

Saturday, February 13, 2021

पहला चुम्बन #हीरेंद्र

मुझे याद है बचपन में हमारे मोहल्ले में एक बांसुरी वाला आया करता था। उसके पास एक डंडा हुआ करता जिस पर अलग अलग रंग और आकार के छोटे बड़े कई बांसुरी झूलते रहते थे। गर्मी की छुट्टियों में जब हम सब दोपहर का खाना पेट भर कर खाने के बाद बिस्तर पर ऊंघ रहे होते तभी कान में उसके बांसुरी की मधुर तान गूंजने लगती। मेरा मन बरबस ही उसकी तरफ खींचा चला जाता। नीम के पेड़ के नीचे बैठ वो अपनी पलकें मूंद कर भाव विभोर मुद्रा में कोई धुन बजा रहा होता। हम भी उसके साथ कहीं डूब से जाते। बाल मन जो अत्यंत ही जिज्ञासु हुआ करता है और उसे जो पसंद आ जाये वो करने के लिए लालायित हो जाता है। ऐसे में मेरा मन भी बांसुरी बजाने को करता। कोशिश भी की पर हम बेसुरे ही रहे। बहुत बाद में...जब बचपन कहीं पीछे छूट गया। और सोलहवां सावन भी आकर चला गया। बचपन के दोस्त, साथी, गली मोहल्ले भी कहीं पीछे छूट गए और हम एक अनजान शहर में नए दोस्तों और सपनों के बीच जीना सीखने की कोशिश में जुटे हुए थे। उसी मोड़ पर मैं उससे मिला। उसकी आवाज़ में वही बांसुरी के मीठे धुन सा सुकून था। उसे सुनकर मेरा मन भावविभोर हो जाता। हम ज़्यादा से ज़्यादा समय आस पास रहना चाहते थे। एक दिन दोनों कहीं बारिश में फंस गए। पहली बार बिल्कुल अकेले थे। आस पास दूर दूर तक कोई नहीं था। हम दोनों बहुत पास थे। हम दोनों मुस्कुरा रहे थे। समय मेरे पहले चुम्बन की जैसे भूमिका बना रहा था। 

और.... 

बात यहीं ख़त्म करता हूँ। 

लेकिन, इतना ज़रूर कहने दीजिये कि बचपन में बांसुरी न बजा पाने का दुःख उस दिन मिट गया था। कितना सुखद है कि मेरे होंठों की नियति बांसुरी नहीं बल्कि तुम थी। उसके बाद हम कभी बेसुरे नहीं रहे। शुक्रिया! #हीरेंद्र #एकप्रेमीकीडायरी #पहलाचुम्बन #kissday #velentinesweek

Monday, February 08, 2021

ये रास्ते मुझे पहचानते हैं #हीरेंद्र

कितनी ही बेचैनियों को विक्रम और बैताल के विक्रम की तरह अपनी पीठ पर लादे हुए चल रहा हूँ. जहाँ मुँह खोलता हूँ वहीं वो बैताल मुझे छोड़ कर फिर-फिर उड़ जाता है. मैं भी उसके पीछे-पीछे एक अभिशप्त की तरह हो लेता हूँ. बस यही एक संतोष है कि रास्ते के गड्ढे, ठोकर, धूल, काँटे  ये सब मुझे अब पहचानने लगे हैं. मैं नहीं जानता कि इस पहचान का हासिल आख़िर क्या है? हाँ, इतना ज़रूर जानता हूँ कि जान-पहचान से ही बड़े-बड़े काम बनते हैं. #हीरेंद्रकीडायरी

Tuesday, September 15, 2020

अनमोल आँसू

आँसू अनमोल होता है। इन्हें सस्ते लोगों के सामने नहीं बहने दीजिये। वे ताना मारेंगे, कमजोर कहेंगे, मूर्ख और मंद बुद्धि भी समझेंगे। जब मन छलक उठे तो एकांत में बैठकर जब तक जी करे, रो लीजिये। फिर खुद के ही पीठ थपथपा कर अपने आप को चीयर कीजिये। यह दुनिया इतनी संवेदनशील नहीं कि आपके आँसू का मर्म समझ सके। कुछ लोग कहेंगे कि आप सहानुभूति पाना चाहते हैं, इसलिए रोने का अभिनय करते हैं। ऐसे लोगों के सामने भूल से भी न रोइए। ये भीतर से बेहद कातर और निष्ठुर लोग होते हैं। होता है कभी कभी दिल नहीं मानता, आप किसी पुराने के आगे भावविभोर हो जाते हैं। आप कलेजा फाड़ कर रोना चाहते हैं। फिर भी खुद को संभालिये। यह समाज पुरुषों पर कुछ ज़्यादा ही ज़्यादती करता है नहीं तो :क्या औरतों की तरह रोता है?' जैसे जुमले चलन में नहीं आते। पुरुष हो या स्त्री कलेजा सभी का फटता है। रोना सभी को आता है। जीवन के किसी नितांत निजी अवसाद या घुटन के क्षणों में आँसू बहने ही लगते हैं। आतुर हृदय संयम नहीं रख पाता। जब भी कभी ऐसा मौका आये तो प्रयास यही कीजियेगा कि किसी ओछे इंसान के कांधे पर आप आश्रित न रहें। क्योंकि आँसू अनमोल है, इन्हें सस्ते लोगों के सामने बहने नहीं दीजिये। #हीरेंद्र #जीवनकीपाठशाला

Sunday, September 13, 2020

अंतिम प्रणाम रघुवंश प्रसाद सिंह



जीवन का पहला टीवी इंटरव्यू मैंने रघुवंश प्रसाद सिंह का किया था.. तब वो मनमोहन सिंह सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री हुआ करते थे.. साल 2006, मैं दूरदर्शन के लिए ट्रेड फेयर कवर कर रहा था.. मंत्री जी किसी को बाइट नहीं दे रहे थे.. मैं धक्का-मुक्की खाते हुए मंच पर चढ़ गया और कहा- 'अंकल आपकी बाइट चाहिये..' वो हँसने लगे.. बोले-' पहली बार आये हो क्या?' मैंने कहा- जी ... और फिर उन्होंने बड़े प्यार से मुझसे बातचीत की। अब कोई भी उनका इंटरव्यू नहीं कर पायेगा। उन्हें अंतिम प्रणाम।

निधन से बस कुछ घंटे पहले ही उन्होंने लालू प्रसाद यादव को चिट्ठी लिख कर पार्टी से अलग होने की बात बता दी थी। उससे पहले वो बीते 32 साल से लालू प्रसाद के साथ हर पल और मुद्दे पर खड़े रहे थे। लालू पर दुनिया भर के आरोप ल लेकिन, रघुवंश बाबू उनके साथ रहकर भी बेदाग रहे। पूरी ज़िंदगी वो जनता से जुड़े सवाल मजबूती से उठाते रहे हैं। उनके निधन के बाद राजनीति के एक युग का अंत भी हो गया।


Monday, August 31, 2020

विदा प्रणब मुखर्जी, एक बच्चे की नज़र से



बाबूजी के साथ एक बार कोलकाता गया था। तारीख़ मुझे अच्छे से याद है- 5 मार्च 1996। हावड़ा ब्रिज पार करते ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस मार्ग पर कोल इंडिया का मुख्यालय है। वहीं Indian National Trade Union Congress (INTUC) का कोई कार्यक्रम था। उस दौर में बाबूजी का अलग ही जलवा था। मैं मंच पर बाबूजी के साथ बैठा था। बगल में एक और सज्जन थे। मेरे गाल को प्यार से खींचते हुए उन्होंने पूछा- की नाम? मैंने कहा- हीरेंद्र झा। उन्होंने बड़े ही प्यार से लेकिन आत्मविश्वास भरते हुए कहा- झाजी का बेटा है, मन से पढ़ना, खूब पढ़ना। मुझे अच्छे से याद है कि बाद में उन्होंने किसी से मंगा कर मुझे एक पैकेट बिस्किट भी पकड़ाया। वो मेरी उनसे इकलौती मुलाकात है। आज जब प्रणव मुखर्जी के निधन की ख़बर आयी तो मैं वहीं इंटक के कार्यक्रम में पहुँच गया। मेरा मन थोड़ा सा इमोशनल हो गया। बड़े लोग, विरले लोग ऐसे ही होते हैं शायद जो एक बच्चे को भी एक ही मुलाकात में वो अहसास दे जाते हैं जो कई बार कोई विश्वविद्यालय भी नहीं दे पाता! नमन करता हूँ आपको। ईश्वर आपको अपने श्री चरणों में स्थान दें।

Saturday, August 29, 2020

हीरेंद्र की डायरी: अतीत और भविष्य नहीं बल्कि वर्तमान के प्रति सजगता ज़रूरी

लॉक डाउन में अकेले रहते हुए बहुत सी बातें मेरे मन में चलती रही हैं। आज हर तरफ जिस तरह का माहौल है, ऐसे में मुझे सब कुछ फ़र्ज़ी लगने लगा है। लगने लगा है कि ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है? यह जान गया हूँ कि जीने के लिए बहुत ज़्यादा भौतिक वस्तुओं की ज़रूरत नहीं होती। सुकून से जो मन को ठीक लगे, सहज भाव से जितना हो सके करते रहना चाहिए। पागलों की तरह किसी चीज़ के पीछे भागते रहने की बेचैनी से कुछ हासिल नहीं होता। ऐसे में आदमी कुछ पा भी ले तो नई बेचैनियां ढूंढ लेगा। इसका कोई अंत नहीं।  आनंद और गरिमा के साथ जीवन जीना इसी में असल सुख है। छोटी छोटी बातों पर जितने समझौते आज हम कर रहे हैं, इसकी कोई ज़रूरत ही नहीं है। उतना तो हम जीने वाले भी नहीं, जितना किसी चीज़ के लिए मरे जा रहे हैं। सुकून, मन की शांति यही बड़ी चीज़ है। मन में उमंग, उल्लास और उत्साह बचा रहे यही असली आनंद है। मेरे भीतर संसार की किसी वस्तु के लिए अब कोई ललक नहीं बाकी है। मेरा मन बस अब इसी में रमता जा रहा है कि मैं कैसा महसूस कर रहा हूँ। अगर मैं अच्छा महसूस कर रहा हूँ तो ठीक। नहीं तो वो करता हूँ जिससे अच्छा महसूस कर सकूँ। उन सभी लोगों से दूर होता जा रहा हूँ जो मुझे छोटा या बुरा महसूस कराते हैं। अपनी छोटी सी दुनिया में कुछ गिने चुने चेहरों के साथ मैं बहुत खुश हूँ। रोज़ एक घंटा काम करके भी मैं इतना कमा लेता हूँ कि महीने भर शांति से जीवनयापन कर सकूँ। इससे ज़्यादा मुझे कुछ चाहिए भी नहीं। मेरा स्वाभिमान बचा रहे, बस यही एक भाव जगता है। मैं अपने वर्तमान को लेकर बहुत ही स्पष्ट और सजग हो चला हूँ। अतीत और भविष्य से मुझे अब बहुत ज़्यादा प्रयोजन नहीं। जो है अभी और इसी पल में है। बात लंबी हो गयी है। आगे की कहानी फिर सही। आज बस इतना ही।

#हीरेंद्रकीडायरी

Thursday, August 27, 2020

राजदीप सरदेसाई और रिया चक्रबर्ती की बातचीत

*वो ड्रग्स लेता था, मैं मना करती थी पर वो अपनी मर्ज़ी का मालिक था। 
*उसने 5 साल तक अपने पिता से बात नहीं की। पिता से उसकी नहीं पटती थी क्योंकि उन्होंने उसकी माँ को छोड़ दिया था। 
*उसकी बहन शराब के नशे में मुझे मोलेस्ट कर चुकी है।
*एक बार उसने मेरे मेकअप का पैसा दिया था तो मुझे ठीक नहीं लगा तो मैंने 35 हज़ार रुपये उसके एकाउंट में ट्रांसफर कर दिए थे।

आज रिया चक्रवर्ती ने आजतक के राजदीप सरदेसाई को इंटरव्यू देते हुए यह सब बातें कहीं। महेश भट्ट को पितातुल्य भी बताया। यह भी कहा कि मेरी माँ आज कल में अस्पताल में भर्ती होने वाली हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि मुझे भी लगने लगा है कि मैं सुसाइड कर लूँ, नहीं तो मुझे और मेरे परिवार को गोली से मारकर मामला ही ख़त्म कर दिया जाए।


मैंने बस रिया की बात लिखी है। अपने मन से एक शब्द भी नहीं लिखा ऊपर। मैं कोई राय या फ़ैसला नहीं दे रहा हूँ पर आज मुझे यक़ीन हो गया है कि सुशांत ने सुसाइड नहीं किया है। 

हीरेंद्र झा

Wednesday, August 26, 2020

एक प्रेमी की डायरी का पंद्रहवाँ पन्ना : हीरेंद्र झा

एक प्रेमी की डायरी : 15


बहुत दिन हुए यार तेरे साथ बैठकर तसल्ली से बात तक नहीं हुई। ऐसे में तुम ही कहो ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है? इस दुनिया में मुझे जो कुछ भी पाना है वो सब स्थगित किये बैठा हूँ। सब कुछ परसों पर टाल रखा है कि शायद कल तुमसे मिलना हो सके। कितनी ही शामें हमने यूँ ही बतकही करते हुए गुज़ार दी हैं, उतने तो मैं तारों को भी नहीं पहचानता। हाँ इकलौते चाँद को जानता हूँ जो गवाह रहा है हमारे मिलन का। एकांत की अपनी एक मर्यादा होती है, होनी भी चाहिए। लेकिन, कभी कभी यह एकांत अपनी सीमा लाँघ कर मुझ पर इस कदर हावी हो जाता है कि जैसे मेरे अस्तित्व पर कोई ग्रहण लग गया हो। कुछ नहीं सूझता। की-बोर्ड पर टाइप करते हुए ख़ुद को संभालने की कोशिश में जुट जाता हूँ। कभी कभी संभल भी जाता हूँ और कई बार बस केवल तड़प कर रह जाता हूँ। ऐसे में कोई मेरे सिरहाने आसमान भी रख दे तो भी वो व्यर्थ मालूम होता है। मुझे वो आसमान नहीं चाहिए जिसके चाँद में तुम्हारा चेहरा, जिसके सूर्य में तुम्हारे प्रेम की तपिश और जिसके इंद्रधनुष में तेरा रंग न हो। 

हीरेंद्र झा

(एक प्रेमी की डायरी से चुनकर कुछ पन्ने हम आपके लिए लाते रहेंगे)

Sunday, August 02, 2020

राखी पर पढ़िए एक भाई की पाती : हीरेंद्र झा

रक्षाबंधन विशेष: ‘दुनिया की सभी बहनों की कलाई पर स्नेह का एक धागा मेरा भी’: हीरेंद्र झा


आज देश भर में रक्षाबंधन का पर्व बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जा रहा है। भाई- बहन के पवित्र रिश्ते का यह पर्व बेहद ख़ास होता है। इस दिन हर बहन अपने प्यारे भाई की कलाई पर राखी बांधती है और इसे एक प्रतीक के रूप में देखा जाता है कि भाई अपनी बहन की रक्षा करेगा। मुझे कहने दीजिए कि यह प्रतीक बहुत पहले ही बदल देना चाहिए था। सच तो यह है कि वो बहनें ही हैं जिनकी दुआएँ भाई की रक्षा करती रही हैं। भाई उनकी रक्षा करेंगे यह कहकर कहीं न कहीं हम बहनों को कमजोर आँकने की गलती सदियों से करते आए हैं। आज के दिन दुनिया की सभी बहनों की कलाई पर स्नेह का एक धागा मेरा भी हो, ताकि उनकी दुआएँ यूं ही करती रहें हम भाइयों की रक्षा!
लिखने वालों ने कभी दीदी और बहन पर उस तरह से कलम नहीं चलाई जिस तरह से माँ, बेटी या महबूब पर लिखा है। आखिर बहनों के साथ यह भेदभाव क्यों? मैं समझता हूँ दीदी या बहन इस दुनिया का एक मात्र ऐसा रिश्ता है जहां कोई मोल-भाव नहीं होता। जहां कोई अपेक्षा नहीं रहती। बरसों बाद मिलने पर भी दीदी अपने भाई को उसकी पसंदीदा डिश खिलाना नहीं भूलती। कभी कोई शिकायत नहीं करती। महीनों बाद भी फोन करो तो यह ताना नहीं मारती कि तुम तो भूल ही गए? यह सब मैं अपने अनुभव से लिख रहा हूँ।


इस दुनिया का हर वो भाई जिसकी एक भी दीदी हो, उसका बचपन एक राजकुमार की तरह ही गुज़रता है। मैं खुशनसीब हूँ कि मेरी अपनी सात दीदियां हैं और एक छोटी बहन भी। यक़ीनन मेरा बचपन दीदीयों की छाँव में एक राजकुमार की तरह ही गुज़रा है। मुझे याद है, बचपन में जब भी कभी मैं बाहर से खेल कर घर आता तो पलक झपकते ही मेरे सामने एक साथ दो,तीन गिलास पानी के होते। मैं एक-एक घूंट पानी सभी गिलासों से पीता। मेरी सभी दीदियों के हृदय को जैसे ठंडक मिल जाती! जब मैं स्कूल जाने लगा तब सब मिलकर मुझे स्कूल जाने के लिए तैयार किया करतीं। कोई शर्ट पहना रही होतीं तो कोई जूते। कोई मेरे घुँघराले बालों में कंघी कर रही होती तो कोई टिफिन पैक करके बैग में रख देती।
जब भी खेलते हुए मुझे थोड़ी भी देर हो जाया करती तो मैं देखता मेरी कोई न कोई दीदी मुझे खोजते हुए बुलाने को आ गई है। मैंने अपनी माँ को कभी रसोई घर में नहीं देखा। यह पंक्तियाँ लिखते हुए मुझे अपनी दीदियों के हाथों के बने आलू परांठे याद आ रहे हैं, घर छोड़ने के बीस बरस बाद भी वो स्वाद मैं कभी भूल ही नहीं सका। न ही कहीं चखने को मिला।
रंगोली, चित्रहार, रामायण, महाभारत, चंद्रकांता, जंगल बुक दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले ये सभी धारावाहिक मैंने अपनी दीदियों की गोद में बैठकर देखे हैं। मेरे पूरे अस्तित्व पर उन सबकी छाप है। क्या आपने कभी सोचा है कि सारे शास्त्र मातृ-ऋण और पितृ-ऋण की बात करते हैं पर वास्तव में बहनों के ऋण की बात कोई नहीं करता, जो हम कभी नहीं चुका पाते।
हमारा परिवार बड़ा था। बाबूजी सरकारी नौकरी में तयशुदा वेतन पाते थे। लेकिन, सम्मान और स्वाभिमान की सीख मुझे बहनों ने ही सिखाई है। एक-एक करके बाबूजी ने सबकी शादी कर दी और वे अपने घर चली गईं। मेरे बारहवीं पास करते-करते सभी दीदियों की शादी हो चुकी थी। शांति दीदी, क्रांति दीदी, नीलम दीदी, बेबी दीदी, नूतन दीदी, गीता दीदी, किरण दीदी बारी-बारी सब अपने ससुराल चली गईं। सबसे आखिर में छोटी बहन रूबी भी। मैं भी घर छोड़ कर कॉलेज के बाद आगे की पढ़ाई करने दिल्ली चला गया। पढ़ाई और करियर बनाने में ऐसा उलझा कि मैं भूल ही गया कि मैं सात दीदियों और एक बहन का भाई हूँ। आज तक किसी भी दीदी ने मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं की। कोई उलाहना नहीं दी, कोई ताना नहीं मारा। बीते बरसों में जब भी उनसे मिला तो उनसे वही प्यार और अपनापन पाया जो दुनिया के और किसी रिश्ते में संभव नहीं। लॉक डाउन और कोरोना संकट के इस साल में भी हर बार की तरह मेरी राखियां मुझ तक पहुँच गई हैं, जिन्हें कलाई पर बांध कर मैं बड़े ताव से इतरा रहा हूँ।


मेरा यह लेख #जनसत्ता में 16 मई 2014 को प्रकाशित हुआ था।








हैप्पी फ्रेंडशिप डे : हीरेंद्र झा


मेरे साथ मेरी दोस्त निमिषा 


अतीत की स्मृतियों में जब भी कभी भटक रहा होता हूँ तो मैंने यही अनुभव किया है कि दोस्ती और मोहब्बत हाथों में हाथ लिए चलती हैं। यारा-दिलदारा जैसे जुमले यूँ ही तो नहीं बनते न?  मेरी सभी प्रेमिकायें मेरी अच्छी दोस्त भी रही हैं। यह बात हमारी पीढ़ी को 'कुछ कुछ होता है' के राहुल और अंजली ने बताई थी कि प्यार दोस्ती है। अगस्त का पहला रविवार हम दोस्ती के दिन के रूप में ही मनाते हैं।  जीवन में कम से कम एक दोस्त तो ऐसा होना ही चाहिए जिससे आप सब कुछ साझा कर सकें। दोस्ती हमारे जीवन का सबसे खूबसूरत रिश्ता होता है। जो बात हम अपने माता-पिता-भाई से नहीं कह पाते वो हम अपने बंधु से कह जाते हैं। कुछ लोग दोस्ती को एक अलग ही नरमी और नमी दे जाते हैं। इन्हीं से जीवन सुगंधित और समृद्ध बनता है। कुछ की खुशबू सदा साथ रहती है तो कुछ स्मृति की गलियों को महकाती रहती हैं।

अपने जीवन को जब बाँट कर देखता हूँ तो धनबाद से लेकर भागलपुर और दिल्ली से लेकर मुंबई तक की इस यात्रा में कई दोस्त बने। आज के दिन वे सब याद आये। स्कूल का दोस्त ऑरोविल, कॉलेज का गौरव और यूनिवर्सिटी में वरुण ये सब आज भी मेरे अच्छे दोस्त हैं। दिल्ली में रहते हुए गीतांजलि, प्रीतिलता और शालिनी जैसे दोस्त मिले। शालिनी से तो मैंने बाद में शादी भी की। अब तो शादी को भी दस साल गुज़र गए। एक सुबह दिल्ली छोड़ कर मुंबई चला आया। यहाँ रीतेश, शिखा और संजय जैसे मित्र मिलें। इरशाद भाई से गहरी दोस्ती हुई। निमिषा मिली जिससे जीवन को एक अलग ही रंग मिला। आज मैं अपने सभी दोस्तों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। बहुत कम लोग जानते हैं कि मैं स्वभाव से अंतर्मुखी रहा हूँ और कभी-कभी मुझे अपना साथ भी गंवारा नहीं होता। ऐसे में जीवन ने कुछ दोस्त दिए हैं तो यह ऊपरवाले का करम ही तो है। दोस्ती ज़िंदाबाद रहे, ज़िंदगी और दुनिया आबाद रहे आज के दिन इससे ज़्यादा कोई क्या चाहेगा?

Friday, July 24, 2020

दिल बेचारा, एक अधूरी कहानी : हीरेंद्र झा






कल देर रात मैंने सुशांत सिंह राजपूत की फ़िल्म #दिलबेचारा देखी। यह फ़िल्म कल ही हॉटस्टार पर रिलीज़ हुई है। ज़ाहिर है यह सुशांत की आख़िरी फ़िल्म है। अब वो बड़े पर्दे पर कभी नहीं नज़र आयेंगे। अब सवाल है कि यह फ़िल्म कैसी है? एक दर्शक के नाते फ़िल्म देखते हुए आप कई बार भावुक हो जाते हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि हमें मालूम है सुशांत अब इस दुनिया में नहीं हैं। अगर वे ज़िंदा होते तो फ़िल्म हम एक अलग नज़रिए से देख पाते। स्क्रीनपले के लिहाज़ से फ़िल्म का सेटअप बिल्कुल परफेक्ट है। कहानी हम जानते थे क्योंकि यह एक हॉलीवुड फ़िल्म की रिमेक है। डायलॉग लिखने वाले को लगता है कि ज़्यादा फ़ीस नहीं दी गयी होगी। संवाद और भी अच्छे हो सकते थे। फ़िल्म के संगीत में एक आकर्षण ज़रूर है और गाने के बोल भी कहीं न कहीं आपके मन को छू लेते हैं। सिनेमेटोग्राफी यानी कैमरे का काम बहुत खूबसूरत है। जमशेदपुर से लेकर पेरिस को जिस तरह से दर्शाया गया है, अद्भुत है। अभिनय की बात करें तो सुशांत सिंह राजपूत का परफॉर्मेंस काफ़ी दमदार है। सैफ़ अली ख़ान थोड़ी देर को ही नज़र आये लेकिन, फ़िल्म का जो इकलौता संदेश है वो उन्हीं के संवाद से जाना जा सकता है। डायरेक्शन की बात नहीं करूंगा। उनके लिए बस 'सेरी' ही कह सकता हूँ। कुछ कमियां भी हैं, उनकी बात जानकार लोग करेंगे। बचपन से हम सब यही तो सुनते आए हैं- 'एक था राजा, एक थी रानी.. दोनों मर गए ख़त्म कहानी।' लेकिन, मरने से पहले जी लेने की बात इशारे में ही सही #दिलबेचारा ने बेहद ही ख़ूबसूरती से बताने की कोशिश की है। कई मामले में यह एक अधूरी सी प्रेम कहानी है। ठीक वैसे ही जैसे सुशांत सिंह राजपूत का सफ़र अधूरा ही रह गया। उनके चाहने वालों के लिए यह फ़िल्म एक सौगात की तरह है। 

मेरी रेटिंग 5 में से 3 स्टार। अलविदा सुशांत सिंह राजपूत!


Saturday, July 04, 2020

काफ़्का के बारे में

लौटना

चालीस की उम्र में फांज काफ़्का; जिनकी शादी नहीं हुई थी और न ही कोई संतान थी; एक बार बर्लिन के एक पार्क में टहल रहे थे। वहाँ उन्हें एक बच्ची मिली जो अपनी प्यारी गुड़िया के खो जाने पर रो रही थी। बच्ची के साथ काफ़्का ने ने भी उस गुड़िया को खोजने की कोशिश की, लेकिन वह बेकार हुई। काफ़्का ने कहा कि अगले दिन हम दोनों यहीं मिलेंगे और गुड़िया को फिर से खोजेंगे।

अगले दिन जब बहुत खोजने पर भी गुड़िया उन्हें नहीं मिली तो काफ़्का ने बच्ची को एक चिट्ठी थमाई जो उस गुड़िया ने "लिखी" थी। उसमें लिखा था, "प्लीज तुम मत रोना, मैं एक ऐसी ट्रिप पर निकली हूँ जिसमें मुझे इस दुनिया को देखना है। मैं अपने रोमांचकारी अनुभवों के बारे में तुम्हें लिखती रहूँगी।"

इस तरह एक कहानी शुरू हो गई जो काफ़्का की ज़िंदगी के अंत तक लिखी जाती रही।

अपनी मुलाकातों के दौरान काफ़्का रोमांचक संवादों से भरी हुई उन चिट्ठियों को बहुत ध्यान से पढ़ते जो अब बच्ची को भी खूब भाने लगी थीं।

आख़िर एक दिन काफ़्का ने लगभग वैसी ही गुड़िया लाकर उसे दिया जैसी कि बच्ची ने खुद खरीदी थी। वह गुड़िया जो अपनी "ट्रिप" के बाद बर्लिन लौट आयी थी। "यह कहीं से भी मेरी अपनी गुड़िया जैसी नहीं लगती है", बच्ची ने कहा। 

काफ़्का ने उसके हाथ में एक और चिट्ठी पकड़ाई जिसमें लिखा था, "मेरी यात्राओं ने मुझे बदल दिया है। मैं अब पहले जैसी नहीं रही।" छोटी बच्ची ने नई गुड़िया को सीने से लगा लिया और ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर ले आई।

एक साल बाद काफ़्का की मृत्यु हो गयी।

कई साल बाद जब बच्ची बड़ी हो गयी तो उसे गुड़िया के अंदर रखी हुई एक चिट्ठी मिली। एक छोटी-सी चिट्ठी, जिसपर काफ़्का के हस्ताक्षर थे और लिखा था, "वैसी हर चीज जिसे तुम प्यार करते हो शायद कभी खो जाएगी, लेकिन अंत में वही प्यार दूसरे रूप में लौटकर तुम्हारे पास आ जाएगा।"

(काफ़्का के जन्मदिन पर प्रस्तुत एक पोस्ट का Pankaj Bose द्वारा किया गया अनुवाद)

Monday, June 15, 2020

फेसबुक पर ज्ञान की बारिश, बेशर्मों ने कहा तैरना चाहिए था

फेसबुक पर हो रही ज्ञान की बारिश, बेशर्मों ने कहा तैरना चाहिए था

मुंबई, हीरेंद्र झा। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत से देश सदमे में है और इस सदमे की झलक कम से कम सोशल मीडिया पर काफी मात्रा में दिख रही है। प्रथम साक्ष्य की माने तो सुशांत ने आत्महत्या कर ली है। रविवार सुबह उनका पार्थिव शरीर उनके बांद्रा वाले घर के बेडरूम में झूलता हुआ मिला। ख़बर आते ही इस पर अलग अलग तरह की प्रतिक्रिया आने लगी। लेकिन, सोशल मीडिया इस मुद्दे पर शोकाकुल तो दिखा लेकिन वो प्रवचन मोड में नज़र आया। किसी ने कहा कि उसे किसी दोस्त से फोन पर बात करनी चाहिए थी। किसी ने लिखा जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होने चाहिए जिससे आप जब चाहो अपना दर्द साझा कर सको। किसी ने यहाँ तक कह दिया कि आप परेशान हैं तो सीधे मुझे कॉल कीजिये, हम सुनेंगे आपको। कोई सुशांत को कायर कह रहा, कोई भगोड़ा। ज़ाहिर है काम तो सुशांत ने गलत ही किया है पर इसे बहुत गहराई से समझने की ज़रूरत है। मनोवैज्ञानिकों की माने तो इंसान कई बार इस कदर अवसाद में डूब जाता है कि किसी भी नाज़ुक मौके पर वो आत्महत्या कर सकता है। जानकार कहते हैं कि इस भावावेश भरे लम्हें में अगर कोई कांधा आपको मिल जाये तो आप इससे बच सकते हैं। जो बिना आपको जज किये, आपके साथ मजबूती से खड़ा हो। यह इतना भी आसान नहीं। ज्ञान देना आसान है, पर जिस पर बीतती है वही जानता है। आज परिवार तक में जिस तरह से रिश्ते टूटने लगे हैं ऐसे में बाहरी दुनिया में कोई हमराज़ मिले यह आसान नहीं। हर इंसान का परिवेश, उसकी सोच और ज़रूरतें अलग होती हैं। उसके इमोशन नितांत ही निजी होते हैं। कई बार झिझक में भी वो किसी से अपना दर्द शेयर नहीं कर पाता। करता भी है तो कई बार उसका मज़ाक बनाकर, कमजोर साबित कर दर्द पर मिट्टी डाल दी जाती है। ऐसा हमेशा से होता आया है। कहते हैं न कि एक विजेता के सौ बाप होते हैं, पर एक हारा हुआ व्यक्ति अनाथ होता है। हमें अपने आस पास की दुनिया के लिए कहीं ज़्यादा संवेदनशील होने की ज़रूरत है। कितने ही दर्द और भावनाओं की नियति है कि वो अनसुनी ही रह जाती हैं। इन्हें सुनने के लिए आत्मिक रूप से आपका जगा हुआ होना पहली शर्त है। फिर दिखावे की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। लोग खुल कर आपसे अपनी बात शेयर कर पायेंगे। जो लोग आत्महत्या की सोच रहे हैं उनसे बस यही कहना चाहूँगा कि जीवन अनमोल है। बकौल ज़ौक़ तो वे घबरा के कहते हैं कि मर जायेंगे, मर कर भी चैन न मिला तो किधर जायेंगे!"

Sunday, May 31, 2020

अलविदा वाजिद

संगीतकार साजिद-वाजिद की यह जोड़ी आज टूट गयी। वाजिद के निधन की ख़बर से आज मन उदास है। हम जैसे नये लोगों से भी वो बेहद प्यार और सम्मान से मिलते थे। उनकी आत्मा को शांति मिले, यही प्रार्थना।




Tuesday, April 28, 2020

#एकप्रेमीकीडायरी #हीरेंद्र

ज़िंदगी से होने को तो बहुत सारी वाज़िब शिकायतें हैं मेरे पास पर साँस लेने की सिर्फ़ एक वजह आज भी तुम ही हो। जैसे चाय की इन चुस्कियों में तेरी स्मृतियों का स्वाद घुला है, वैसे ही खिलते-महकते ये फूल मुझे तुम्हारी निर्मल मुस्कान की याद दिलाये संभाले रहती हैं। मैंने पिछले एक महीने में तुमको जितना याद किया है, इतने पर रामायण काल में परमपिता ब्रह्मा स्वयं प्रकट हो जाया करते थे। आज भी अगर वे आ जाएं और मुझे कुछ वरदान देने का मन बनाएं तो मैं उनसे बस यही माँगू कि मेरे चित्त से तुम्हारी छवि कभी धूमिल न होने पाए। सुना तुमने उन्होंने तथास्तु कहा है। क्या कहा? मैं बौरा गया हूँ। हो सकता है.. क्योंकि किसी के प्रेम में बौरा जाने की पूरी संभावना होती है। इसके अलावा कोई और विकल्प भी तो नहीं! #एकप्रेमीकीडायरी #हीरेंद्र

Monday, April 27, 2020

एक प्रेमी की डायरी 😊 #हीरेंद्र

तुमको याद करते हुए जब मेरा मन खुद से ही बात कर रहा होता है ...
तो मैंने यह अनुभव किया है, कि मेरा ये मन, कई बार मुझे ही सुनने से इंकार कर देता है...

हाँ, जब ज़िक्र तुम्हारा आ जाए तो यह इकलौता सा मेरा दिल भी मेरी नहीं सुनता।

 हवा, मौसम, चाँद, सितारे, बादल, पेड़, ये फूल... कोई भी मेरी नहीं सुनता।

 जिसे मैं अपना हमराज़ समझता हूँ, वो समंदर भी मुँह फेर कर मुझे पहचानने से इंकार कर देता है.

 तुम यहाँ नहीं होती, पर ये सब तुम्हारी तरफ़दारी में लग जाते हैं.
यूँ लगता है मानो, कि इस पूरी प्रकृति को तुमने मेरी पहरेदारी में लगा रखा है...

 कभी-कभी तो मैं भी खुद को एक कटघरे में खड़ा पाता हूँ.

सुनो...मुझे इनमें से किसी पर भी भरोसा नहीं।
तुम भी इनका ऐतबार मत करना।

मैं जानता हूँ कि एक चिड़िया की चोंच तक से उसकी उदासी पहचान लेने वाली तुम...इतनी निष्ठुर नहीं, कि मेरी संवेदनाएँ तुम तक न पहुँचती हों...

 #हीरेंद्र #एकप्रेमीकीडायरी

Sunday, April 12, 2020

जलियांवाला बाग नरसंहार की कहानी, इन तस्वीरों की ज़ुबानी #JallianwalaBaghmassacre


आज वैशाखी है. पंजाब और हरियाणा में इस पर्व की ख़ासी धूम रहती है. नयी फ़सल की आमद का यह जश्न हर साल इसी तारीख यानी 13 अप्रैल को ही मनाया जाता है.  लेकिन, यह तारीख इतिहास में भी अपनी एक अलग भयावहता के लिए अंकित है. जलियांवाला बाग नरसंहार के बारे में किसने नहीं सुना. आज से 101 साल पहले इसी दिन सारी दुनिया ने अंग्रेज़ों का एक क्रूर और अमानवीय चेहरा देखा था.






राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने रॉलेट एक्ट के विरोध में देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया था, जिसके बाद मार्च के अंत और अप्रैल की शुरुआत में देश के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए और उसका परिणाम 13 अप्रैल 1919 के नरसंहार के रूप में दिखा.

 देश के अधिकांश शहरों में 30 मार्च और 6 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया गया. हालांकि इस हड़ताल का सबसे ज़्यादा असर पंजाब में देखने को मिला. 13 अप्रैल को लगभग शाम के साढ़े चार बज रहे थे, जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में मौजूद क़रीब 25 से 30 हज़ार लोगों पर गोलियां बरसाने का आदेश दे दिया. वो भी बिना किसी पूर्व चेतावनी के. ये गोलीबारी क़रीब दस मिनट तक बिना सेकंड रुके होती रही. जनरल डायर के आदेश के बाद सैनिकों ने क़रीब 1650 राउंड गोलियां चलाईं. गोलियां चलाते-चलाते चलाने वाले थक चुके थे और 379 ज़िंदा लोग लाश बन चुके थे. (अनाधिकारिक तौर पर कहा जाता है कि क़रीब एक हज़ार लोगों की मौत हुई थी और दो हज़ार से ज़्यादा लोग घायल हुए थे).




क्या आप जानते हैं 1997 में ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ ने इस स्मारक पर मृतकों को श्रद्धांजलि दी थी। साल 2013 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन भी इस स्मारक पर आए थे। विजिटर्स बुक में उन्होंनें लिखा कि "ब्रिटिश इतिहास की यह एक शर्मनाक घटना थी।

विदा 2021

साल 2021 को अगर 364 पन्नों की एक किताब मान लूँ तो ज़्यादातर पन्ने ख़ुशगवार, शानदार और अपनों के प्यार से महकते मालूम होते हैं। हिसाब-किताब अगर ...