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Saturday, July 04, 2020

काफ़्का के बारे में

लौटना

चालीस की उम्र में फांज काफ़्का; जिनकी शादी नहीं हुई थी और न ही कोई संतान थी; एक बार बर्लिन के एक पार्क में टहल रहे थे। वहाँ उन्हें एक बच्ची मिली जो अपनी प्यारी गुड़िया के खो जाने पर रो रही थी। बच्ची के साथ काफ़्का ने ने भी उस गुड़िया को खोजने की कोशिश की, लेकिन वह बेकार हुई। काफ़्का ने कहा कि अगले दिन हम दोनों यहीं मिलेंगे और गुड़िया को फिर से खोजेंगे।

अगले दिन जब बहुत खोजने पर भी गुड़िया उन्हें नहीं मिली तो काफ़्का ने बच्ची को एक चिट्ठी थमाई जो उस गुड़िया ने "लिखी" थी। उसमें लिखा था, "प्लीज तुम मत रोना, मैं एक ऐसी ट्रिप पर निकली हूँ जिसमें मुझे इस दुनिया को देखना है। मैं अपने रोमांचकारी अनुभवों के बारे में तुम्हें लिखती रहूँगी।"

इस तरह एक कहानी शुरू हो गई जो काफ़्का की ज़िंदगी के अंत तक लिखी जाती रही।

अपनी मुलाकातों के दौरान काफ़्का रोमांचक संवादों से भरी हुई उन चिट्ठियों को बहुत ध्यान से पढ़ते जो अब बच्ची को भी खूब भाने लगी थीं।

आख़िर एक दिन काफ़्का ने लगभग वैसी ही गुड़िया लाकर उसे दिया जैसी कि बच्ची ने खुद खरीदी थी। वह गुड़िया जो अपनी "ट्रिप" के बाद बर्लिन लौट आयी थी। "यह कहीं से भी मेरी अपनी गुड़िया जैसी नहीं लगती है", बच्ची ने कहा। 

काफ़्का ने उसके हाथ में एक और चिट्ठी पकड़ाई जिसमें लिखा था, "मेरी यात्राओं ने मुझे बदल दिया है। मैं अब पहले जैसी नहीं रही।" छोटी बच्ची ने नई गुड़िया को सीने से लगा लिया और ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर ले आई।

एक साल बाद काफ़्का की मृत्यु हो गयी।

कई साल बाद जब बच्ची बड़ी हो गयी तो उसे गुड़िया के अंदर रखी हुई एक चिट्ठी मिली। एक छोटी-सी चिट्ठी, जिसपर काफ़्का के हस्ताक्षर थे और लिखा था, "वैसी हर चीज जिसे तुम प्यार करते हो शायद कभी खो जाएगी, लेकिन अंत में वही प्यार दूसरे रूप में लौटकर तुम्हारे पास आ जाएगा।"

(काफ़्का के जन्मदिन पर प्रस्तुत एक पोस्ट का Pankaj Bose द्वारा किया गया अनुवाद)

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