मैं सिर्फ देह ही नहीं हूँ, एक पिंजरा भी हूँ, यहाँ एक चिड़िया भी रहती है... एक मंदिर भी हूँ, जहां एक देवता बसता है... एक बाजार भी हूँ , जहां मोल-भाव चलता रहता है... एक किताब भी हूँ , जिसमें रोज़ एक पन्ना जुड जाता है... एक कब्रिस्तान भी, जहां कुछ मकबरे हैं... एक बाग भी, जहां कुछ फूल खिले हैं... एक कतरा समंदर का भी है ... और हिमालय का भी... कुछ से अनभिज्ञ हूँ, कुछ से परिचित हूँ... अनगिनत कणों को समेटा हूँ... कि मैं ज़िंदा हूँ !!! - हीरेंद्र
Friday, April 20, 2018
सेक्स क्रान्ति बनाम रेप की मानसिकता- हीरेंद्र झा
Wednesday, April 18, 2018
गुड़गांव बना गुरूग्राम #पहली वर्षगांठ
वो गुड़गांव ही रहती थी। अक्सर उसे उसके घर तक छोड़ने जाता। उन दिनों मेट्रो वहाँ तक नहीं जाती थी तो हम आईआईटी गेट या धौला कुआँ से कैब पकड़ा करते। जब उसे छोड़ कर अकेला लौट रहा होता तो लगता एक मन जैसे वहीं छोड़ आया हूँ। फिर ये सिलसिला धीरे-धीरे कम हो गया और ख़त्म भी। लेकिन, मेरे भीतर एक गुड़गांव हमेशा ज़िंदा रहा है। सुना है कि अब वो शहर 'गुरुग्राम' के नाम से जाना जाएगा। क्या फर्क पड़ता है? जिस नाम से पुकार लो पर कुछ चीज़ें चाह कर भी नहीं बदली जा सकतीं। खैर, उसे आख़िरी बार टीवी पर ही कलाम साहब के जनाज़े के पास देखा था... उस दिन भी वो उतनी ही खूबसूरत लगी थी। वो शहर भी हमेशा खूबसूरत बना रहे। आमीन। #हीरेंद्र
" एक अधूरी प्रेम कहानी"
Friday, April 13, 2018
अगर 'Cook' भी होता तो मैं एक अच्छा 'Cook' होता, जानिये पंकज त्रिपाठी के ये 5 दिलचस्प जवाब
हाल के वर्षों में पंकज त्रिपाठी ने अपने सहज अभिनय से सबका ध्यान खींचा है। 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर', 'निल बट्टे सन्नाटा', 'अनारकली ऑफ़ आरा' 'मुन्ना माइकल' और 'न्यूटन' जैसी फ़िल्मों में अपनी एक अलग छाप छोड़ने वाले पंकज त्रिपाठी ने पिछले दिनों जागरण डॉट कॉम से एक लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं उस बातचीत के कुछ चुनिन्दा अंश।
'गांव का आदमी हूं'
पंकज त्रिपाठी मुंबई में रहते हैं। लेकिन, उन्हें जब भी मौका मिलता है वो अपने गांव ज़रूर जाते हैं। पंकज को अपने गांव (गोपालगंज,बिहार) से बेहद लगाव है। वो कहते हैं- "अगर कोई पेड़ अपने रूट से न जुड़ा रहे तो कैसे सर्वाइव करेगा? हमारे गांव, खेत-खलिहान, रिश्ते-नाते, गाय-बकरियां, नदियां इनसे हमें ताकत मिलती है।" उनके मुताबिक- आज उनमें जो भी संघर्ष करने की क्षमता है वो उनके गांव की ही देन है। वो कहते हैं -"मैं कहीं भी रहूं, मैं अपने गांव से जुड़ा रहता हूं क्योंकि मैं गांव का आदमी हूं।"
एक्टिंग का कोई शॉर्ट-टर्म कोर्स नहीं होता
गौरतलब है कि पंकज नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा, दिल्ली से भी लम्बे वक़्त तक जुड़े रहे। पंकज बताते हैं कि-"आम तौर पर आज ऐसा हो गया है कि कोई भी सोचता है तीन महीने और छह महीने का वो कोई कोर्स कर लेगा और एक्टर बन जाएगा तो ऐसा नहीं है। मैंने दस साल एक्टिंग को दिए हैं। लेकिन, आज की पीढ़ी के पास धीरज नहीं है।" वो आगे कहते हैं - "जैसा कि मैंने कहा कि मैं गांव में रहा हूं। मैंने खेती की है। हम बीज डालते, खाद-पानी डालते, उसकी देखभाल करते तब जाकर फ़सल काटने की आदत रही है हमारी। इतना धीरज आज की जेनेरेशन में नहीं है। वो सब-कुछ इंस्टेंट चाहते हैं! उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि एक्टिंग का कोई शॉर्ट-टर्म कोर्स नहीं होता।"
बतौर एक्टर एक संतुलन जरुरी है
किस तरह के किरदार ज्यादा लुभाते हैं? इसके जवाब में पंकज कहते हैं कि एक एक्टर को हर तरह की फ़िल्में करनी चाहिए। बकौल पंकज- "मैं समझता हूं कि बतौर एक्टर एक संतुलन ज़रूरी है। अगर आप कमर्शियल फ़िल्मों में नज़र आ रहे हैं तो कुछ छोटी और महत्वपूर्ण फ़िल्मों से भी आपको जुड़े रहना होगा। दोनों का दर्शक अलग है। आप बड़ी फ़िल्में करते हैं साथ ही छोटी फ़िल्मों में भी नज़र आएं तो इनसे उन छोटी फ़िल्मों को भी ज्यादा दर्शक मिलेंगे। यह सिनेमा के लिए एक अच्छी बात होगी!"
पॉपुलर होना और यादगार होने में फ़र्क है
कामयाबी को किस तरह से देखते हैं? इस बाबत पंकज कहते हैं कि- "आज का दौर कॉपी, पेस्ट, शेयर और सेल्फ़ी का दौर है। इसमें कोई ठहरकर जांच-पड़ताल नहीं करता। गुणवत्ता को परखने का समय किसी के पास नहीं होता। ऐसे में हो सकता है आप पेज थ्री पर छपने लग जाएं, पॉपुलर भी हो जाएं। लेकिन, उसमें स्थायित्व नहीं होगा। वो क्षणिक होगा। पॉपुलर होने और यादगार बन जाने में फ़र्क होता है और ऐसा तब तक संभव नहीं जब तक आप फ़ेक लाइफ़ जी रहे हैं। पंकज के मुताबिक अगर किसी में ट्रुथफुलनेस नहीं है तो फिर बाकी चीजों का कोई मायना नहीं!
मैं एक कुक भी होता तो एक अच्छा कुक होता
अगर आप एक्टर नहीं होते तो क्या होते? इस सवाल के जवाब में पंकज कहते हैं कि- " मैं एक कुक होता। क्योंकि मैंने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की है। मैं किसी फाइव स्टार होटल में कहीं इंडियन रेसिपी बना रहा होता।" आगे वो कहते हैं- "लेकिन, एक बात ज़रूर है कि अगर मैं कुक भी होता तो एक अच्छा कुक होता! कुक ही क्यों अगर मैं कहीं क्लर्क भी होता तो एक अच्छा क्लर्क होता! क्योंकि एक सिंसेरिटी (निष्ठा) मुझमें हमेशा से रही है कि जीवन में जो करना अच्छे से करना, मन से करना।"
By Hirendra J
https://www.jagran.com/entertainment/bollywood-pankaj-tripathi-latest-interview-after-special-mention-in-newton-in-national-award-16442347.html
Wednesday, April 11, 2018
'बाइक' वाला लड़का
Tuesday, April 10, 2018
‘मुझे गीत लिखने में मज़ा नहीं आता’, जानिये गीतकार राज शेखर के कुछ दिलचस्प जवाब
Friday, March 30, 2018
रोमांस, प्रेम और सेक्स में अंतर है- पहली किश्त
विदा 2021
साल 2021 को अगर 364 पन्नों की एक किताब मान लूँ तो ज़्यादातर पन्ने ख़ुशगवार, शानदार और अपनों के प्यार से महकते मालूम होते हैं। हिसाब-किताब अगर ...
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"हम हैं बच्चे आज के बच्चे हमें न समझो तुम अक़्ल के कच्चे हम जानते हैं झूठ और सच हम जानते हैं गुड टच, बैड टच मम्मी, पापा जब...
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साल 2021 को अगर 364 पन्नों की एक किताब मान लूँ तो ज़्यादातर पन्ने ख़ुशगवार, शानदार और अपनों के प्यार से महकते मालूम होते हैं। हिसाब-किताब अगर ...
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मुझे याद है बचपन में हमारे मोहल्ले में एक बांसुरी वाला आया करता था। उसके पास एक डंडा हुआ करता जिस पर अलग अलग रंग और आकार के छोटे बड़े कई बांस...





