मैं सिर्फ देह ही नहीं हूँ, एक पिंजरा भी हूँ, यहाँ एक चिड़िया भी रहती है... एक मंदिर भी हूँ, जहां एक देवता बसता है... एक बाजार भी हूँ , जहां मोल-भाव चलता रहता है... एक किताब भी हूँ , जिसमें रोज़ एक पन्ना जुड जाता है... एक कब्रिस्तान भी, जहां कुछ मकबरे हैं... एक बाग भी, जहां कुछ फूल खिले हैं... एक कतरा समंदर का भी है ... और हिमालय का भी... कुछ से अनभिज्ञ हूँ, कुछ से परिचित हूँ... अनगिनत कणों को समेटा हूँ... कि मैं ज़िंदा हूँ !!! - हीरेंद्र
Tuesday, April 28, 2020
#एकप्रेमीकीडायरी #हीरेंद्र
ज़िंदगी से होने को तो बहुत सारी वाज़िब शिकायतें हैं मेरे पास पर साँस लेने की सिर्फ़ एक वजह आज भी तुम ही हो। जैसे चाय की इन चुस्कियों में तेरी स्मृतियों का स्वाद घुला है, वैसे ही खिलते-महकते ये फूल मुझे तुम्हारी निर्मल मुस्कान की याद दिलाये संभाले रहती हैं। मैंने पिछले एक महीने में तुमको जितना याद किया है, इतने पर रामायण काल में परमपिता ब्रह्मा स्वयं प्रकट हो जाया करते थे। आज भी अगर वे आ जाएं और मुझे कुछ वरदान देने का मन बनाएं तो मैं उनसे बस यही माँगू कि मेरे चित्त से तुम्हारी छवि कभी धूमिल न होने पाए। सुना तुमने उन्होंने तथास्तु कहा है। क्या कहा? मैं बौरा गया हूँ। हो सकता है.. क्योंकि किसी के प्रेम में बौरा जाने की पूरी संभावना होती है। इसके अलावा कोई और विकल्प भी तो नहीं! #एकप्रेमीकीडायरी #हीरेंद्र
Monday, April 27, 2020
एक प्रेमी की डायरी 😊 #हीरेंद्र
तुमको याद करते हुए जब मेरा मन खुद से ही बात कर रहा होता है ...
तो मैंने यह अनुभव किया है, कि मेरा ये मन, कई बार मुझे ही सुनने से इंकार कर देता है...
हाँ, जब ज़िक्र तुम्हारा आ जाए तो यह इकलौता सा मेरा दिल भी मेरी नहीं सुनता।
हवा, मौसम, चाँद, सितारे, बादल, पेड़, ये फूल... कोई भी मेरी नहीं सुनता।
जिसे मैं अपना हमराज़ समझता हूँ, वो समंदर भी मुँह फेर कर मुझे पहचानने से इंकार कर देता है.
तुम यहाँ नहीं होती, पर ये सब तुम्हारी तरफ़दारी में लग जाते हैं.
यूँ लगता है मानो, कि इस पूरी प्रकृति को तुमने मेरी पहरेदारी में लगा रखा है...
कभी-कभी तो मैं भी खुद को एक कटघरे में खड़ा पाता हूँ.
सुनो...मुझे इनमें से किसी पर भी भरोसा नहीं।
तुम भी इनका ऐतबार मत करना।
मैं जानता हूँ कि एक चिड़िया की चोंच तक से उसकी उदासी पहचान लेने वाली तुम...इतनी निष्ठुर नहीं, कि मेरी संवेदनाएँ तुम तक न पहुँचती हों...
#हीरेंद्र #एकप्रेमीकीडायरी
Sunday, April 12, 2020
जलियांवाला बाग नरसंहार की कहानी, इन तस्वीरों की ज़ुबानी #JallianwalaBaghmassacre
आज वैशाखी है. पंजाब और हरियाणा में इस पर्व की ख़ासी धूम रहती है. नयी फ़सल की आमद का यह जश्न हर साल इसी तारीख यानी 13 अप्रैल को ही मनाया जाता है. लेकिन, यह तारीख इतिहास में भी अपनी एक अलग भयावहता के लिए अंकित है. जलियांवाला बाग नरसंहार के बारे में किसने नहीं सुना. आज से 101 साल पहले इसी दिन सारी दुनिया ने अंग्रेज़ों का एक क्रूर और अमानवीय चेहरा देखा था.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने रॉलेट एक्ट के विरोध में देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया था, जिसके बाद मार्च के अंत और अप्रैल की शुरुआत में देश के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए और उसका परिणाम 13 अप्रैल 1919 के नरसंहार के रूप में दिखा.
देश के अधिकांश शहरों में 30 मार्च और 6 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया गया. हालांकि इस हड़ताल का सबसे ज़्यादा असर पंजाब में देखने को मिला. 13 अप्रैल को लगभग शाम के साढ़े चार बज रहे थे, जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में मौजूद क़रीब 25 से 30 हज़ार लोगों पर गोलियां बरसाने का आदेश दे दिया. वो भी बिना किसी पूर्व चेतावनी के. ये गोलीबारी क़रीब दस मिनट तक बिना सेकंड रुके होती रही. जनरल डायर के आदेश के बाद सैनिकों ने क़रीब 1650 राउंड गोलियां चलाईं. गोलियां चलाते-चलाते चलाने वाले थक चुके थे और 379 ज़िंदा लोग लाश बन चुके थे. (अनाधिकारिक तौर पर कहा जाता है कि क़रीब एक हज़ार लोगों की मौत हुई थी और दो हज़ार से ज़्यादा लोग घायल हुए थे).
क्या आप जानते हैं 1997 में ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ ने इस स्मारक पर मृतकों को श्रद्धांजलि दी थी। साल 2013 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन भी इस स्मारक पर आए थे। विजिटर्स बुक में उन्होंनें लिखा कि "ब्रिटिश इतिहास की यह एक शर्मनाक घटना थी।
Tuesday, March 31, 2020
Monday, March 30, 2020
कोरोना डायरी #CoronaDiary
जीवन का हिसाब स्पष्ट है - खुश रहोगे तो खुशियां मिलेगी और दुखी रहोगे तो दर्द. यह बात समझने में कई बार हमें ज़िंदगी भर का सफर तय करना पड़ सकता है. लेकिन, इसके लिए ज़िंदगी हमें हर कदम पर मौके देती है, इशारे करती है. बस आपको सचेत रहना है और पूरी समग्रता से उन इशारों को समझना होता है.
यह लिखने में भले आसान हो पर इस पर अमल करना उतना सहज नहीं। हर इंसान का अपना अनुभव और दृश्टिकोण होता है. जिसमें तपकर हम किसी चीज़ के प्रति अपना एक नजरिया बनाते हैं. यह नजरिया उधार का तो बिलकुल भी नहीं हो सकता। कबीर ने कहा या बुद्ध ने कहा यही सोचकर कोई बात नहीं मान लेनी चाहिए। जब तक हम स्वयं उस अनुभूति से साक्षात्कार न कर लें दुनिया भर के दर्शन और साहित्य बेमानी हैं.
आप आँखें बंद करके खुद को टटोलिये कि आप इस जीवन से क्या चाहते हैं? अगर आप देख पायें तो आप खुशकिस्मत हैं क्योंकि दस में से नौ लोगों को तो यह बिलकुल भी नहीं मालूम होता कि वो इस जीवन से क्या चाहते हैं. इन दोनों तरह के लोगों को अलग-अलग तरीके से चीज़ों को समझना होगा। पहले वे लोग जो देख पा रहे हैं कि उन्हें इस जीवन से क्या चाहिए, वो बस उन्हीं पर अपना ध्यान केंद्रित रखें. क्योंकि जीवन बहुत ही विराट है- यहाँ थोड़ा-थोड़ा सब कुछ पा लेना भी आसान नहीं। और थोड़ा-थोड़ा पाकर भी आप बेचैन ही रहेंगे। जो भी पाना हो वो सम्पूर्णता के साथ पाना, तभी आप आनंदित हो सकते हैं. अगर आप स्पष्ट हैं कि आप को जीवन से क्या चाहिए तो आप यह समझ लें कि आपको बस उसी पर केंद्रित रहना है. व्यर्थ के प्रयासों में समय न गंवा दें. मान लीजिये कि आपको एक महाकाव्य रचना है तो बस आपका पूरा ध्यान इसी बिंदु पर होना चाहिए। सोते-जागते आप अपने महाकाव्य को साकार होते दिखे। अगर आपको अपने मन में महाकाव्य के पन्ने नज़र आने लगे तो समझो आपने महाकाव्य रच दिया। यह और भी बातों के लिए उतना ही सटीक है.
दूसरी बात कि आपको अभी भी नहीं मालूम कि आपको इस जीवन से क्या चाहिए। तो बेहतर है खुद के साथ ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त गुज़ारे। अपने आप को समझें। ह्रदय की गहराइयों में उत्तर कर खुद को देखें कि ऐसी कौन सी बात है जो आपको मिल जाए तो आप खुश हो जाएंगे। अगर आप ईमानदारी से खुद का मूल्यांकन करें तो इस बात की कोई भी वजह नहीं कि आप निरुत्तर रहे.
और जब एक बार आप समझ गए कि आपको इस जीवन से क्या चाहिए तब आगे का रास्ता स्वतः ही निर्मित होना शुरू हो जाता है. इस शोध के लिए यह 21 दिनों का लॉकडाउन बहुत ही कारगर है. यह मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ. जीवन में एक से ज़्यादा बार ऐसा हुआ है कि मैंने आत्महत्या करने का सोचा है. लेकिन, नहीं अब मैं समझ गया हूँ कि मरने से पहले ज़िंदगी एक बार जी ही लेनी चाहिए। इति शुभम!
हीरेंद्र झा
यह लिखने में भले आसान हो पर इस पर अमल करना उतना सहज नहीं। हर इंसान का अपना अनुभव और दृश्टिकोण होता है. जिसमें तपकर हम किसी चीज़ के प्रति अपना एक नजरिया बनाते हैं. यह नजरिया उधार का तो बिलकुल भी नहीं हो सकता। कबीर ने कहा या बुद्ध ने कहा यही सोचकर कोई बात नहीं मान लेनी चाहिए। जब तक हम स्वयं उस अनुभूति से साक्षात्कार न कर लें दुनिया भर के दर्शन और साहित्य बेमानी हैं.
आप आँखें बंद करके खुद को टटोलिये कि आप इस जीवन से क्या चाहते हैं? अगर आप देख पायें तो आप खुशकिस्मत हैं क्योंकि दस में से नौ लोगों को तो यह बिलकुल भी नहीं मालूम होता कि वो इस जीवन से क्या चाहते हैं. इन दोनों तरह के लोगों को अलग-अलग तरीके से चीज़ों को समझना होगा। पहले वे लोग जो देख पा रहे हैं कि उन्हें इस जीवन से क्या चाहिए, वो बस उन्हीं पर अपना ध्यान केंद्रित रखें. क्योंकि जीवन बहुत ही विराट है- यहाँ थोड़ा-थोड़ा सब कुछ पा लेना भी आसान नहीं। और थोड़ा-थोड़ा पाकर भी आप बेचैन ही रहेंगे। जो भी पाना हो वो सम्पूर्णता के साथ पाना, तभी आप आनंदित हो सकते हैं. अगर आप स्पष्ट हैं कि आप को जीवन से क्या चाहिए तो आप यह समझ लें कि आपको बस उसी पर केंद्रित रहना है. व्यर्थ के प्रयासों में समय न गंवा दें. मान लीजिये कि आपको एक महाकाव्य रचना है तो बस आपका पूरा ध्यान इसी बिंदु पर होना चाहिए। सोते-जागते आप अपने महाकाव्य को साकार होते दिखे। अगर आपको अपने मन में महाकाव्य के पन्ने नज़र आने लगे तो समझो आपने महाकाव्य रच दिया। यह और भी बातों के लिए उतना ही सटीक है.
दूसरी बात कि आपको अभी भी नहीं मालूम कि आपको इस जीवन से क्या चाहिए। तो बेहतर है खुद के साथ ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त गुज़ारे। अपने आप को समझें। ह्रदय की गहराइयों में उत्तर कर खुद को देखें कि ऐसी कौन सी बात है जो आपको मिल जाए तो आप खुश हो जाएंगे। अगर आप ईमानदारी से खुद का मूल्यांकन करें तो इस बात की कोई भी वजह नहीं कि आप निरुत्तर रहे.
और जब एक बार आप समझ गए कि आपको इस जीवन से क्या चाहिए तब आगे का रास्ता स्वतः ही निर्मित होना शुरू हो जाता है. इस शोध के लिए यह 21 दिनों का लॉकडाउन बहुत ही कारगर है. यह मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ. जीवन में एक से ज़्यादा बार ऐसा हुआ है कि मैंने आत्महत्या करने का सोचा है. लेकिन, नहीं अब मैं समझ गया हूँ कि मरने से पहले ज़िंदगी एक बार जी ही लेनी चाहिए। इति शुभम!
हीरेंद्र झा
Thursday, March 26, 2020
#CoronaDiary #Day2
आज का दिन थोड़ा बेहतर गुज़रा और आज मैंने अगले 7 दिनों के लिए अपना रूटीन बना लिया है. उससे पहले आज कुछ काम को लेकर भी कुछ लोगों से बात हुई और इस दौरान यह तय हुआ कि कोरोना के इस लॉक डाउन का लाभ उठाकर कुछ प्रोजेक्ट के काम पूरे कर लिए जायें। संभवतः अब इस दिशा में भी काफी वाट लगने वाला है.
बहरहाल, आज दिन में ओशो के कुछ वीडियो सुने। ग्रेजुएशन के दौरान मैंने ओशो को खूब पढ़ा है और उसका मुझे लाभ भी हुआ. लेकिन, अरसे से ओशो और उनकी बातें भूला सा था एक बार फिर उन लम्हों को जी रहा हूँ. मैंने अनुभव किया है कि संन्यास मेरा मूल स्वभाव है. इसलिए भी इस राह पर जाने से थोड़ा बचता हूँ. क्योंकि यह बहुत ही आसान है मेरे लिए. और अगर मैं इस राह पर बढ़ चला तो मुझसे जो लोग जुड़े हुए हैं उन्हें परेशानी हो सकती है. इसलिए कहीं न कहीं मन में यह रहता है कि इस संसार में एक संन्यासी की तरह क्यों न रहा जाए? मैं कुछ लिखता भी हूँ तो कई बार उस लिखे में मुझे वो दर्शन और पद्धति महसूस होती है.
जो मेरी अगले 7 दिन की दिनचर्या रहने वाली है. उसकी बात करूँ तो मैंने तय किया है कि अगले 7 दिनों तक मैं लगातार ध्यान की अवस्था में रहूँगा। यानी मेरा पूरा ध्यान मेरी साँस पर टिका होगा। उसके आने और जाने पर. भीतर गहरे तक साँस लूँगा। ज़्यादा से ज़्यादा प्राणवायु मेरे भीतर जाए इसका ख़्याल रखूंगा। साँस के अलावा मैं अगले सात दिनों तक भोजन को लेकर ज़्यादा नहीं सोचने वाला। जितने कम में काम चल जाए बस उतना ही भोजन करूँगा। जीवन के लिए जितना ज़रूरी हो सिर्फ उतना खाऊंगा। जो भी करूँगा एकाग्रचित्त होकर करूँगा। एकाग्रता के लिए सबसे सहज और हितकर मार्ग यही है कि आप अपने साँसों पर ध्यान बनाकर रखें। इसके अलावा कुछ और काम करने पड़े जैसे नहाना, भोजन आदि तो वह भी पूरी एकाग्रता के साथ किया जाए.
इन तीनों बातों के अलावा चौथी बात जिसका मुझे ध्यान रखना है, वो है -मौन. मेरी कोशिश रहेगी कि मैं 24 घटे मन, वचन और विचार से मौन रहूं। कोई आफत ही आ जाए तो दो, चार शब्द बोलकर या कागज़ पर लिख कर काम चल जाए तो यह कर लूँ. यह कठिन है पर इसका अपना ही आनंद है. सिर्फ बोलना ही बंद नहीं करना है बल्कि देखना और सुनना भी न्यूनतम कर देना। ज़्यादातर वक़्त मेरे आँखों पर इस दौरान पट्टी बंधा होगा और मैं पूरी तरह से सिर्फ ध्यान में रहने का प्रयास करूँगा। आखिरी बात यह समय मैं किसी मजबूरी में नहीं करूँगा, बल्कि पूरे आनंद भाव से करने वाला हूँ. मुझे कुछ याद नहीं कि कोरोना की वजह से पूरे देश में बंद की स्तिथि है. मैं घर से बाहर नहीं निकल सकता। कि मैं सबसे दूर यहाँ मुंबई में अकेले हूँ. मुझे बस इतना याद है कि मैं सुख और आनंद में हूँ और इस समय को एक अवसर की तरह देख रहा हूँ. फिर जीवन में मुझे यह सात दिनों का विशेष ध्यान करने का अवसर न मिले तो क्यों न इस समय का लाभ उठा लूँ. कुछ बहुत ज़रूरी कोई फोन आ गया (काम के सिलसिले में) तो उस तरह के फोन मैं ज़रूर उठाऊंगा और कुछ लिखना हुआ तो वो भी करूँगा। लेकिन, अगर ऐसा न हुआ तो वो और भी अच्छा। अपने अनुभव मैं आप सबको ब्लॉग पर बताता रहूँगा।
- हीरेंद्र झा
बहरहाल, आज दिन में ओशो के कुछ वीडियो सुने। ग्रेजुएशन के दौरान मैंने ओशो को खूब पढ़ा है और उसका मुझे लाभ भी हुआ. लेकिन, अरसे से ओशो और उनकी बातें भूला सा था एक बार फिर उन लम्हों को जी रहा हूँ. मैंने अनुभव किया है कि संन्यास मेरा मूल स्वभाव है. इसलिए भी इस राह पर जाने से थोड़ा बचता हूँ. क्योंकि यह बहुत ही आसान है मेरे लिए. और अगर मैं इस राह पर बढ़ चला तो मुझसे जो लोग जुड़े हुए हैं उन्हें परेशानी हो सकती है. इसलिए कहीं न कहीं मन में यह रहता है कि इस संसार में एक संन्यासी की तरह क्यों न रहा जाए? मैं कुछ लिखता भी हूँ तो कई बार उस लिखे में मुझे वो दर्शन और पद्धति महसूस होती है.
जो मेरी अगले 7 दिन की दिनचर्या रहने वाली है. उसकी बात करूँ तो मैंने तय किया है कि अगले 7 दिनों तक मैं लगातार ध्यान की अवस्था में रहूँगा। यानी मेरा पूरा ध्यान मेरी साँस पर टिका होगा। उसके आने और जाने पर. भीतर गहरे तक साँस लूँगा। ज़्यादा से ज़्यादा प्राणवायु मेरे भीतर जाए इसका ख़्याल रखूंगा। साँस के अलावा मैं अगले सात दिनों तक भोजन को लेकर ज़्यादा नहीं सोचने वाला। जितने कम में काम चल जाए बस उतना ही भोजन करूँगा। जीवन के लिए जितना ज़रूरी हो सिर्फ उतना खाऊंगा। जो भी करूँगा एकाग्रचित्त होकर करूँगा। एकाग्रता के लिए सबसे सहज और हितकर मार्ग यही है कि आप अपने साँसों पर ध्यान बनाकर रखें। इसके अलावा कुछ और काम करने पड़े जैसे नहाना, भोजन आदि तो वह भी पूरी एकाग्रता के साथ किया जाए.
इन तीनों बातों के अलावा चौथी बात जिसका मुझे ध्यान रखना है, वो है -मौन. मेरी कोशिश रहेगी कि मैं 24 घटे मन, वचन और विचार से मौन रहूं। कोई आफत ही आ जाए तो दो, चार शब्द बोलकर या कागज़ पर लिख कर काम चल जाए तो यह कर लूँ. यह कठिन है पर इसका अपना ही आनंद है. सिर्फ बोलना ही बंद नहीं करना है बल्कि देखना और सुनना भी न्यूनतम कर देना। ज़्यादातर वक़्त मेरे आँखों पर इस दौरान पट्टी बंधा होगा और मैं पूरी तरह से सिर्फ ध्यान में रहने का प्रयास करूँगा। आखिरी बात यह समय मैं किसी मजबूरी में नहीं करूँगा, बल्कि पूरे आनंद भाव से करने वाला हूँ. मुझे कुछ याद नहीं कि कोरोना की वजह से पूरे देश में बंद की स्तिथि है. मैं घर से बाहर नहीं निकल सकता। कि मैं सबसे दूर यहाँ मुंबई में अकेले हूँ. मुझे बस इतना याद है कि मैं सुख और आनंद में हूँ और इस समय को एक अवसर की तरह देख रहा हूँ. फिर जीवन में मुझे यह सात दिनों का विशेष ध्यान करने का अवसर न मिले तो क्यों न इस समय का लाभ उठा लूँ. कुछ बहुत ज़रूरी कोई फोन आ गया (काम के सिलसिले में) तो उस तरह के फोन मैं ज़रूर उठाऊंगा और कुछ लिखना हुआ तो वो भी करूँगा। लेकिन, अगर ऐसा न हुआ तो वो और भी अच्छा। अपने अनुभव मैं आप सबको ब्लॉग पर बताता रहूँगा।
- हीरेंद्र झा
Wednesday, March 25, 2020
#CoronaDiary Day1
हालांकि मुंबई में शनिवार 21 मार्च से ही कर्फ्यू लग गया था और आज यानी 25 मार्च से तो देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा हो ही चुकी है. कोरोना से बचने का यह सबसे आसान और कारगर उपाय है. ऐसे में पूरा देश इस वक़्त अपने-अपने घरों में है और पूरे २१ दिनों तक उन्हें ऐसे ही रहना है.
घर-परिवार से दूर अकेले मुंबई में अपने एक छोटे से कमरे में हूँ. मैं बिना लाग-लपेट के यह कहना चाहता हूँ कि यह एक बड़ी मुश्किल समय है. मैंने अपने पूरे जीवन में ऐसा समय नहीं देखा। घर-परिवार और अपनों के साथ 21 तो क्या मैं सौ दिन भी बिना किसी परेशानी के घर पर रह सकता हूँ. पर ऐसे अकेले यह मेरे लिए भी एक रहस्य ही होगा जो मैं 21 दिनों तक बचा रह गया.
देश के अलग-अलग हिस्सों से कुछ तस्वीरें आ रही हैं, जिनमें इक्का-दुक्का लोग सड़क पर मास्क पहने घुमते दिख रहे हैं. ज़रूरी सेवा देने वाले जैसे पुलिस, डॉक्टर्स, बैंकर्स और पत्रकार आदि वैसे भी घरों से निकल रहे हैं. यहाँ एक बात मैं जोड़ना चाहूँगा कि मुंबई में मैं जिस सोसायटी में रह रहा हूँ, यहाँ मेन गेट पर ताला लगा दिया गया है और आपातकालीन स्तिथि में ही किसी को बाहर निकलने की इज़ाज़त है. यह नियम बना दिया गया है कि सुबह आठ बजे से लेकर नौ बजे तक मेन गेट खोला जाएगा और आप इसी दौरान अपने खाने-पीने की ज़रूरी चीज़ें लेकर आ सकते हैं. शुक्र है कम से कम यह एक अच्छी बात है.
बहरहाल, खाने-पीने का मैंने कुछ यह सोचा है कि चूड़ा, चना, मूंगफली, चावल-दाल जो सहज और आसानी से बन जाए, उसी में किसी तरह यह दिन बीता देना है. ज़्यादा खाने-पीने के चक्कर में नहीं रहना है. एक वक़्त भी पेट भर कर खा लिया तो अगले दिन तक छुट्टी। तो भोजन को लेकर मैं बहुत ज़्यादा चिंतित नहीं हूँ. मेरी चिंता थोड़ी अलग है.
मन में यह ज़रूर आता है कि जीवन में ऐसा कभी कठिन समय आये तो इंसान को अपने परिवार के साथ होना चाहिए। एकजुट होकर एक दूसरे को सहारा देते हुए हम इस तरह के हालातों से निकल सकते हैं. मेरे साथ वर्तमान में ऐसे हालात हैं कि बुजुर्ग माता-पिता धनबाद में है. उनका पूरा समय घर पर ही बीतता है. मेरी एक दीदी अपने परिवार के साथ वहां है, जो उनका ख़्याल रख रही हैं. बाबूजी रोज़ बिना नागा एक बार कॉल ज़रूर कर लेते हैं और मेरी आवाज़ सुनकर बुलंद हो जाते हैं. पत्नी है जो अपने मायके यानी लखनऊ में रहती है. आठ साल की प्यारी बिटिया ख़ुशी भी अपनी मम्मी के साथ वहीं रह रही है. मेरे साथ संयोग कुछ ऐसा रहा कि कभी बिटिया के साथ रहने का मौका मुझे नहीं मिला है. वो नानी के घर ही जन्मीं और वहीं देखते-देखते आठ बरस की हो गयी हमारी लाड़ो। उसे फोन पर बात करना पसंद नहीं इसलिए मेरी उससे न के बराबर बातचीत होती है. बीते एक साल में हम चार बार मिले हैं और कुल मिलाकर आठ दस दिन हमने साथ बिताये होंगे। पत्नी का रूटीन कुछ इस तरह का है कि उसके पास बिल्कुल भी फुर्सत नहीं। स्टेट बैंक की नौकरी के बाद जो वक़्त उसे मिलता है उसपर उसकी बीमार माँ और प्यारी बिटिया का अधिकार है. उसकी मम्मी यानी मेरी सास का लीवर काफी हद तक डैमेज हो चुका है और उनकी हालत काफी गंभीर रहती है. कई बार उन्हें इलाज के लिए लखनऊ से लेकर दिल्ली भागना होता है. ऐसे में हम दोनों पति-पत्नी के बीच कई बार सप्ताह भर भी बात नहीं हो पाती। मैं उसे बहुत मिस भी करता हूँ. पर शायद यही नियति है और किसी तरह यहाँ मुंबई में जीने की कोशिश कर रहा हूँ.
सामान्य दिनों में काम में उलझ कर दिन बीत जाया करता है पर ऐसे लॉक डाउन के समय में मेरी बेचैनी का बढ़ना वाजिब ही है. दिन भर घर पर अकेले क्या और कैसे किया जाए, आसान नहीं। न किसी अपने से कोई संवाद ही है और न ही एक पारस्परिक सहयोग वाली बातचीत कि जिसके सहारे आप अपना समय काट सकें। थक-हार कर मेरे पास यही विकल्प है कि - कितने पढूं, फ़िल्में देखूँ और लिखूँ। लिखकर बेचैनी मेरी थोड़ी कम होती रही है.
तो मैंने सोचा क्यों न इस लॉक डाउन में रोज़ अपने ब्लॉग पर #CoronaDiary लिखूं। इसी बहाने अगर मैं ज़िंदा बचा रहा तो आज से दस-बीस साल बाद भी यह समय याद रह जाएगा। तो इस कड़ी में यह दूसरी पोस्ट है. कल भी मैंने कोरोनो पर कुछ लिखा है और आज भूमिका बांधते हुए आप सभी को अपनी मानसिक और व्यावहारिक स्थिति बता दी है.
आज यू tube पर अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा की फिल्म 'छोटी सी बात' फिर से देखी। बेहद मासूम सी फिल्म है. उसके बाद संदीप माहेश्वरी के कुछ वीडियो सुनते हुए बर्तन भी धोये। और अब सोचा सोने से पहले यह पोस्ट लिख ही दूँ. वैसे अभी रात के सिर्फ दस ही बजे हैं. कल भी तीन बजे के बाद ही सोया था और आज भी देर होगी ही. देखते हैं यह दिन अपने आखिरी घंटे में कैसा रहता है. अब रफ़ी के गीत सुन रहा हूँ. पूरी प्लानिंग कर ली है कि कल से मेरा रूटीन क्या रहने वाला है. वो सब कल लिखता हूँ. अगर आप यह पोस्ट पढ़ पा रहे हैं तो यही कहूंगा कि घर पर ही रहे, बाहर न निकले. अपना ख़्याल रखें। हाथ धोते रहे. और यह सब किसलिए? देश ही नहीं मानवता के लिए भी. जी! शुक्रिया।
आपका हीरेंद्र
घर-परिवार से दूर अकेले मुंबई में अपने एक छोटे से कमरे में हूँ. मैं बिना लाग-लपेट के यह कहना चाहता हूँ कि यह एक बड़ी मुश्किल समय है. मैंने अपने पूरे जीवन में ऐसा समय नहीं देखा। घर-परिवार और अपनों के साथ 21 तो क्या मैं सौ दिन भी बिना किसी परेशानी के घर पर रह सकता हूँ. पर ऐसे अकेले यह मेरे लिए भी एक रहस्य ही होगा जो मैं 21 दिनों तक बचा रह गया.
देश के अलग-अलग हिस्सों से कुछ तस्वीरें आ रही हैं, जिनमें इक्का-दुक्का लोग सड़क पर मास्क पहने घुमते दिख रहे हैं. ज़रूरी सेवा देने वाले जैसे पुलिस, डॉक्टर्स, बैंकर्स और पत्रकार आदि वैसे भी घरों से निकल रहे हैं. यहाँ एक बात मैं जोड़ना चाहूँगा कि मुंबई में मैं जिस सोसायटी में रह रहा हूँ, यहाँ मेन गेट पर ताला लगा दिया गया है और आपातकालीन स्तिथि में ही किसी को बाहर निकलने की इज़ाज़त है. यह नियम बना दिया गया है कि सुबह आठ बजे से लेकर नौ बजे तक मेन गेट खोला जाएगा और आप इसी दौरान अपने खाने-पीने की ज़रूरी चीज़ें लेकर आ सकते हैं. शुक्र है कम से कम यह एक अच्छी बात है.
बहरहाल, खाने-पीने का मैंने कुछ यह सोचा है कि चूड़ा, चना, मूंगफली, चावल-दाल जो सहज और आसानी से बन जाए, उसी में किसी तरह यह दिन बीता देना है. ज़्यादा खाने-पीने के चक्कर में नहीं रहना है. एक वक़्त भी पेट भर कर खा लिया तो अगले दिन तक छुट्टी। तो भोजन को लेकर मैं बहुत ज़्यादा चिंतित नहीं हूँ. मेरी चिंता थोड़ी अलग है.
मन में यह ज़रूर आता है कि जीवन में ऐसा कभी कठिन समय आये तो इंसान को अपने परिवार के साथ होना चाहिए। एकजुट होकर एक दूसरे को सहारा देते हुए हम इस तरह के हालातों से निकल सकते हैं. मेरे साथ वर्तमान में ऐसे हालात हैं कि बुजुर्ग माता-पिता धनबाद में है. उनका पूरा समय घर पर ही बीतता है. मेरी एक दीदी अपने परिवार के साथ वहां है, जो उनका ख़्याल रख रही हैं. बाबूजी रोज़ बिना नागा एक बार कॉल ज़रूर कर लेते हैं और मेरी आवाज़ सुनकर बुलंद हो जाते हैं. पत्नी है जो अपने मायके यानी लखनऊ में रहती है. आठ साल की प्यारी बिटिया ख़ुशी भी अपनी मम्मी के साथ वहीं रह रही है. मेरे साथ संयोग कुछ ऐसा रहा कि कभी बिटिया के साथ रहने का मौका मुझे नहीं मिला है. वो नानी के घर ही जन्मीं और वहीं देखते-देखते आठ बरस की हो गयी हमारी लाड़ो। उसे फोन पर बात करना पसंद नहीं इसलिए मेरी उससे न के बराबर बातचीत होती है. बीते एक साल में हम चार बार मिले हैं और कुल मिलाकर आठ दस दिन हमने साथ बिताये होंगे। पत्नी का रूटीन कुछ इस तरह का है कि उसके पास बिल्कुल भी फुर्सत नहीं। स्टेट बैंक की नौकरी के बाद जो वक़्त उसे मिलता है उसपर उसकी बीमार माँ और प्यारी बिटिया का अधिकार है. उसकी मम्मी यानी मेरी सास का लीवर काफी हद तक डैमेज हो चुका है और उनकी हालत काफी गंभीर रहती है. कई बार उन्हें इलाज के लिए लखनऊ से लेकर दिल्ली भागना होता है. ऐसे में हम दोनों पति-पत्नी के बीच कई बार सप्ताह भर भी बात नहीं हो पाती। मैं उसे बहुत मिस भी करता हूँ. पर शायद यही नियति है और किसी तरह यहाँ मुंबई में जीने की कोशिश कर रहा हूँ.
सामान्य दिनों में काम में उलझ कर दिन बीत जाया करता है पर ऐसे लॉक डाउन के समय में मेरी बेचैनी का बढ़ना वाजिब ही है. दिन भर घर पर अकेले क्या और कैसे किया जाए, आसान नहीं। न किसी अपने से कोई संवाद ही है और न ही एक पारस्परिक सहयोग वाली बातचीत कि जिसके सहारे आप अपना समय काट सकें। थक-हार कर मेरे पास यही विकल्प है कि - कितने पढूं, फ़िल्में देखूँ और लिखूँ। लिखकर बेचैनी मेरी थोड़ी कम होती रही है.
तो मैंने सोचा क्यों न इस लॉक डाउन में रोज़ अपने ब्लॉग पर #CoronaDiary लिखूं। इसी बहाने अगर मैं ज़िंदा बचा रहा तो आज से दस-बीस साल बाद भी यह समय याद रह जाएगा। तो इस कड़ी में यह दूसरी पोस्ट है. कल भी मैंने कोरोनो पर कुछ लिखा है और आज भूमिका बांधते हुए आप सभी को अपनी मानसिक और व्यावहारिक स्थिति बता दी है.
आज यू tube पर अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा की फिल्म 'छोटी सी बात' फिर से देखी। बेहद मासूम सी फिल्म है. उसके बाद संदीप माहेश्वरी के कुछ वीडियो सुनते हुए बर्तन भी धोये। और अब सोचा सोने से पहले यह पोस्ट लिख ही दूँ. वैसे अभी रात के सिर्फ दस ही बजे हैं. कल भी तीन बजे के बाद ही सोया था और आज भी देर होगी ही. देखते हैं यह दिन अपने आखिरी घंटे में कैसा रहता है. अब रफ़ी के गीत सुन रहा हूँ. पूरी प्लानिंग कर ली है कि कल से मेरा रूटीन क्या रहने वाला है. वो सब कल लिखता हूँ. अगर आप यह पोस्ट पढ़ पा रहे हैं तो यही कहूंगा कि घर पर ही रहे, बाहर न निकले. अपना ख़्याल रखें। हाथ धोते रहे. और यह सब किसलिए? देश ही नहीं मानवता के लिए भी. जी! शुक्रिया।
आपका हीरेंद्र
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साल 2021 को अगर 364 पन्नों की एक किताब मान लूँ तो ज़्यादातर पन्ने ख़ुशगवार, शानदार और अपनों के प्यार से महकते मालूम होते हैं। हिसाब-किताब अगर ...
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मुझे याद है बचपन में हमारे मोहल्ले में एक बांसुरी वाला आया करता था। उसके पास एक डंडा हुआ करता जिस पर अलग अलग रंग और आकार के छोटे बड़े कई बांस...