महादेवी वर्मा

कहता जग दुख को प्यार न कर !

अनबींधे मोती यह दृग के
बँध पाये बन्धन में किसके?
पल पल बनते पल पल मिटते,
तू निष्फल गुथ गुथ हार न कर
कहता जग दुख को प्यार न कर !

दर्पणमय है अणु अणु मेरा,
प्रतिबिम्बित रोम रोम तेरा;
अपनी प्रतिछाया से भोले!
इतनी अनुनय मनुहार न कर!
कहता जग दुख को प्यार न कर !

सुख-मधु मे क्या दुख का मिश्रण?
दुख-विष में क्या सुख-मिश्री-कण!
जाना कलियों के देश तुझे
तो शूलों से श्रंगार न कर!
कहता जग दुख को प्यार न कर !