Tuesday, April 24, 2018

हीरेंद्र की गुगली यानी मस्ती का डोज़!

इस हिस्से में पढ़िये कुछ ऐसी ही दिलचस्प गुगली. क्योंकि आखिरी पंक्ति में आप जान पायेंगे कि आखिर बात किसकी हो रही थी! 

#गुगली 1

पिछले सात साल से वो साये की तरह मेरे साथ रहा.. मैं भी उसके बिना एक पल नहीं टिक सकता था इस दुनिया में! सच कहूँ तो जब भी मुझे जितने रुपयों की ज़रूरत हुई उसने बिना किसी सवाल के मुझे   खर्चे के लिए दिए... आज जब मैंने उसे गौर से देखा तो पाया कि अब वो फटेहाल हो गया है.. उसमें वो पहले सी चमक नहीं रही... अब ये मुझे पुराना और बदसूरत लगने लगा है.. अब इस साथी से विदा लेने का समय आ गया है.. हाँ, अब इसे बदलने का समय आ गया है.. #बैंक जाकर नए एटीएम कार्ड के लिए फॉर्म भर आया हूँ... दस दिनों में नया कार्ड आ जाएगा!



  

#गुगली 2


कभी भी बोल उठती हो तुम..आते-जाते, सिसकते-मुस्काते, सोते-जागते, रास्तों पर, घर में या बीच सफर में...कभी-कभी ऐसे कांपने लगती हो जैसे कोई भूचाल सा आ गया हो..कभी-कभी शोर में तुम्हे सुन नहीं पाता, कभी-कभी अनसुना कर देता हूँ तो कभी अनदेखा भी..कभी ख़ामोशी से कोई सन्देश ले आती हो...कभी खुशी तो कभी परेशानी भी दे जाती हो! तुम्हारा होना अब आदत है मेरी...और हाँ, जब उसका नाम तेरे गाल पर पढ़ता हूँ तो तेरी मिलकियत सुहाने लगती है...ऐसे ही मेरी ज़िन्दगी में संवाद, संगीत और समर्पण के रंग भरते रहना...मेरे मोबाइल तुम्हे ढेर सारा प्यार :) 


#गुगली 3


आज वो बहुत दिनों बाद मेरे घर आई थी। भला आती भी कैसे सरपंचों ने उसे चरित्रहीन बताकर उस पर पाबंदी लगा रखी थी। मुझे हमेशा से लगता था कि वो गंगा की तरह पवित्र है पर मैं उसके लिए कुछ न कर सका! आज जब वो आई तो हम एक दूसरे को काफी देर तक तकते रहे। नए कपड़ों में वो कुछ ज़्यादा ही लुभा रही थी। चलो माना कि दो मिनट वाली बात झूठी है पर गर्म होकर तैयार होने में उसे ज़्यादा वक़्त नहीं लगा। मैंने भी बातों में ज़्यादा वक़्त जाया न किया। अपने होंठ उसके दहकते होंठों पर रख दिए। एक भूखा प्रेमी और करता भी क्या? #Welcome Maggie. अब दुबारा पढ़िए। हम मैगी की ही बात कर रहे थे :)


(यह तब लिखी थी जब बैन होने के बाद मैगी फिर से मार्किट में आई थी)




#गुगली 4


कई दिनों से उसके उदास चेहरे की झाईयां मुझे खटक रही थीं.. रोज़ सोचता लेकिन, किसी न किसी वजह से मेरा ध्यान कहीं और रम जाता. रात को सोते समय वो अपनी सुस्त रफ्तार से फिर मुझे उलाहना देता और मैं उसे अनदेखा कर सो जाता! सुबह की अफरा-तफरी में फिर वो तन्हा डोलता रहता और हम भी उसे भूले रहते! पर आज संडे ने ये मौका दिया कि उसकी उदासी दूर कर सकूँ! कपड़े से हौले हौले उसके बाजुओं को दुलराया, सहलाया..जमी धूल की परतें हटाईं, उसके चेहरे से झाईंयां मिटाईं..फिर गीले कपड़े से उसे चमकाया..तब जाकर फिर वो मुस्कुराया! अब वो मदमस्त होकर नाच रहा है. मुझे शीतलता प्रदान कर रहा है.. जी, मैं अपने पंखें की बात कर रहा हूँ. #हीरेंद्र

Sunday, April 22, 2018

अच्छे लोग

वे बहुत अच्छे लोग हैं..उनके घर का मुखिया सुबह सवेरे टहल कर आता..चाय के साथ अखबार निपटाता और फिर चमकते-इठलाते दफ्तर को निकल जाता..बच्चे कॉलेज चले जाते और बच्चों की माँ लग जाती घर को करीने से सजाने, संवारने में..सुबह जो सबको टिफिन में बांधा था, उसी से पेट भर कर कभी फोन तो कभी टीवी देखते शाम का इंतज़ार...साहब दफ्तर में हर घंटे पर एक सिगरेट पीते ..और आठ सिगरेट फूँक कर घर लौट आते..बच्चे भी कॉलेज से लौटकर म्यूजिक क्लास और स्विमिंग के लिए निकल जाते...देर शाम सब इकट्ठे होकर कुछ वक्त साथ बैठते..खाते- गाते- सो जाते! उनकी अपनी एक अलग दुनिया है..उन्हें किसी अमिताभ, सचिन, मोदी, दामिनी या गुड़िया से कोई विशेष मतलब कभी नहीं रहा..कल पता चला कि वो जुलाई के बाद कनाडा शिफ्ट हो रहे हैं..उन्हें इंडिया में अब मन नहीं लगता..आस-पास के लोग बताते हैं कि इनका कभी किसी से झगड़ा नहीं हुआ.. इनके घर से कभी किसी ने तेज आवाज़ नहीं सुनी..वे सच में बहुत अच्छे लोग हैं! (जो लिखना चाहता था, वो न लिख पाया..पर आप समझ सकें तो एक तस्वीर यह भी है )

कविता- गुड टच, बैड टच


"हम हैं बच्चे आज के बच्चे
हमें न समझो तुम अक़्ल के कच्चे
हम जानते हैं झूठ और सच
हम जानते हैं गुड टच, बैड टच

मम्मी, पापा जब गले लगाते
इसको ही हम गुड टच कहते
बैड टच होता है वो
हमारे प्राइवेट बॉडी पार्ट्स छूता है जो

बच्चों, हमारे लिप्स, चेस्ट, कमर के नीचे...आगे या पीछे ये होते हैं हमारे प्राइवेट बॉडी पार्ट्स

कोई बैड टच करे तो शोर मचाओ
जाकर मम्मी, पापा को बतलाओ #हीरेंद्र

ये poem लिखी थी कभी मैंने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के लिए। हो सके तो अपने बच्चों को रटवा दीजियेगा।

रेप के विरोध में सोशल मीडिया पर लगातार लोग लिख रहे हैं. यह एक अच्छी बात है. बस यह रफ़्तार और आवाज़ थमनी नहीं चाहिए. रेप को लेकर जो कुछ नए कानून की बात आई है उस सन्दर्भ में यह कहना गलत न होगा कि सोशल मीडिया के दबाव का भी कुछ न कुछ असर हुआ ही होगा .

मैंने खुद प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को ट्वीट किया था कि स्वच्छता अभियान के तर्ज पर रेप के खिलाफ़ भी मुहीम शुरू कीजिये. मैं नहीं जानता हमारे लिखने, बोलने से कितना फर्क पड़ता है. लेकिन, यह ज़रूर जानता हूं कि लिखते/बोलते रहना होगा!

इस विषय पर जो मैंने पहले दो भागों में लिखा है, वो आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं..

सेक्स क्रान्ति बनाम रेप की मानसिकता- हीरेंद्र झा

सेक्स क्रान्ति बनाम रेप की मानसिकता (भाग 2) - हीरेंद्र झा







Saturday, April 21, 2018

सेक्स क्रान्ति बनाम रेप की मानसिकता (भाग 2) - हीरेंद्र झा

उस दिन मैं मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस स्टेशन पर था. मुझे जबलपुर की ट्रेन पकड़नी थी जो रात के 11 बजे खुलनी थी. मैं वहां 8 बजे ही पहुंच गया. ज़ाहिर है बहुत समय था मेरे पास. सोचा कुछ खा-पी लेते हैं और यही सोचकर मैं स्टेशन से बाहर निकल कर दूसरी तरफ को बढ़ गया. जो लोग मुंबई से बाहर के हैं उन्हें यह बता दूँ कि यह जो इलाका है यह अंग्रेजों ने बनाया है . ऊँची ऊँची चर्चनुमा बिल्डिंगें हैं और स्टेशन परिसर भी भव्य चर्च की किसी पुरानी इमारत सा है. रात के इस वक्त काफी अंधेरा पसरा था. हल्की हल्की रोशनी कहीं-कहीं से छिटक कर आ रही थी.  स्टेशन के ठीक राईट साइड में कई पेड़ भी लगे हैं कतारों से.

मैं जब थोड़ा आगे बढ़ा तो मैंने देखा कि पेड़ के नीचे एक लड़की खड़ी है, यही 17, 18 साल की होगी. मुझे देखकर उसने अदा से मुस्कुराने की कोशिश की. मैं थोड़ा झिझका फिर आगे बढ़ गया. दस कदम पर दूसरी लड़की मिली, वो भी मुझे देख कर स्माइल करने लगी. मैं अनदेखा कर फिर आगे बढ़ गया और इस बार तीसरी लड़की ने मुझे टोक ही दिया. ऐ चलता क्या? बगल में होटल है. एक हजार लूंगी, पूरा मज़ा दूंगी! अब तक मुझे समझ आ चुका था कि ये सब लड़कियाँ कौन हैं? मैं तीसरी लड़की के पास रुक गया. मैंने कहा- चलो. वो मेरे साथ हो ली. मुझे मालूम है कि स्टेशन के दूसरी तरफ गेट पर चाय की एक अच्छी दूकान है. मैंने कहा - चलो चाय पीते हैं पहले. उसने मुझे गौर से देखा और साथ चल पड़ी!

चाय पीते हुए मैंने उससे सवाल किया कि कब से कर रही हो ये सब? उसने कहा जब 12 साल की थी तब से. अब क्या उम्र होगी तुम्हारी? उसने कहा तुम्हें मालूम है न लड़कियों से उम्र नहीं पूछते. मैंने कहा नहीं मुझे ये नहीं मालूम. 'साला बड़ा शाना है रे' कह कर उसने मुझे गाली दी और कहा 26 साल. मैंने कहा- ओह, पूरा वनवास भुगत लिया है तुमने! 'बनवास' कह कर वो चौंकी? मैंने कहा हां अपने यहां वनवास 14 साल का ही होता है न जो तुम भुगत चुकी हो! 14 साल से इस पेशे में हो!



उसने कहा ज्यादा बात नहीं करने का. चाय खत्म कर और चल. तेरे बाद दो तीन को और निपटाने हैं! मैंने कहा कितना कमा लेती हो? उसने कहा दो ढाई हजार रोज़. कभी कभी सूखा भी रहता है. कोई पुलिस वाला मिल गया तो चवन्नी भी नहीं मिलती. फ्री में चाहिए बहन *** को!

तुम्हारी तरह कितनी लड़कियाँ होंगी इस इलाके में? साला तू सवाल बहुत पूछता है? चल न काहे को समय खराब कर रहा है. मैंने कहा कि ढाई हजार ले लेना मुझसे. निश्चिंत रहो. जो पूछता हूं बताओ. अब वो स्थिर हो गयी. मुझे लगा कि शायद उसको कोई संदेह है. मैंने पर्स से निकाल कर उसे पूरे पैसे दे दिए. अब वो थोड़ी सहज थी. मैंने कहा चलो दो घंटे हैं मेरे पास. कुछ खा लेते हैं. फिर हम वहां से एक टैक्सी लेकर कोलाबा की तरफ निकल गए. वेश्यावृति पर, उनकी समस्याओं पर, उनकी जीवन शैली पर उस लड़की ने बहुत कुछ बताया. बताया कि स्टेशन के आस-पास डेढ़ सौ लड़कियाँ हैं जो यह काम करती है. हम जहां उतरे उस इलाके के बारे में उसने बताया कि यहां तो पच्चास हजार से लेकर पांच लाख तक की रेट की लड़कियाँ मिलती हैं. उसने चिढते हुए कहा कि हमें तो पांच सौ और हज़ार देने में भी लोगों की फट जाती है! उस 'अजनबी' लड़की से बहुत बातें हुईं और फिर मैंने उससे विदा लिया और तय समय पर स्टेशन पहुंचकर अपनी ट्रेन पकड़ ली. उसने एक बार कहा- चलोगे नहीं? मैंने कुछ नहीं कहा..लौट आया!

खैर, उस दिन मुझे में समझ आया कि अगर ये लड़कियाँ न हो तो रेप की संख्या और भी कहीं ज्यादा होगी! देश के कई इलाकों में वेश्यावृति छुप कर ही सही पर हो रही है. और वहां ग्राहक भी पहुंच ही रहे हैं! देश, विदेश से लेकर नेपाल और बंगलादेश से लड़कियाँ यहां लायी जा रही हैं और इस धंधे में झोंकी जा रही हैं!

कहीं न कहीं सेक्स के प्रति जो पागलपन है उसने ही इन चकलाघरों को आबाद बनाकर रखा है. पता नहीं आप इन बातों को कैसे लेंगे पर मेरी राय तो यही है कि जो कमबख्त रेप करता है वो कम से कम इन वेश्वाओं के पास ही चला जाया करे.. कम से कम किसी मासूम की ज़िन्दगी तो तबाह नहीं होगी? एक तरीका यह भी हो सकता है रेप को रोकने का. अन्यथा न लीजियेगा, लेकिन, कुछ तो उपाय तलाशने ही होंगे न?

आज जब चार महीने से लेकर चार वर्ष तक की बच्ची के साथ रेप की खबर सुनता हूं तो बहुत ही असहाय सा महसूस करता हूं. ऐसे सिरफिरों से क्या कहेंगे आप? भला चार महीने या चार वर्ष की बच्ची को देखकर भी किसी को उत्तेजना हो सकती है? या फिर ये कहीं और की ठरक इन बच्चियों पर निकाला करते हैं?

इन मासूम बच्चों को हमें मिलकर बचाना होगा. सबसे ज़रुरी बात तो यह कि बच्चे के साथ हर वक्त उसके परिवार से कोई न कोई ज़रूर रहे. मां-बाप, दीदी, दादी कोई भी..बच्ची अकेली न रहे. अब समाज और सरकार तो कुछ कर नहीं रही तो हमें ही अब अपने बच्चों की सुरक्षा करनी है. क्या पता आपके सब्जी वाले से लेकर आपका धोबी या फिर आपका देवर ही आपकी मासूम पर बुरी नज़र रख रहा हो? बहुत भयावाह दौर है? तो किसी भी सूरत में बच्ची को अकेले ना छोड़े!



तीसरी बात, आज मोबाइल और इंटरनेट ने जाहिलों को एक ऐसी दुनिया दिखा दी है जहां वो फैंटेसी में रहने लगे हैं. पोर्न वीडियो में दिख रही लड़की और औरत को वो हर आस-पास की लड़कियों में देखने लगे हैं. उनके साथ वो सब कुछ करने के लिए उत्तेजित होने लगे हैं! यह बहुत ही खतरनाक स्तिथि है. इसे समझना होगा. वो बस एक मौके की तलाश में है कि वो अपनी खुमारी कहीं बहा सके. इन दरिंदों से हमें सचेत रहना होगा! इतनी बेरोजगारी और बेचैनी है इस देश में कि एक बड़ी आबादी सेक्स में ही सुकून तलाश रही है! इस मनोविज्ञान को समझना आसान नहीं पर अब इस पर खुलकर बात करने का समय आ गया है!

(यह लेख मैं जारी रखूँगा. मैं चाहता हूँ इस पर विस्तार से लिखूं और किसी समाधान तक पहुँचने की कोशिश करूँ)  
इससे पहले इस विषय पर मैंने कुछ और भी लिखा है, वो आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं-

सेक्स क्रान्ति बनाम रेप की मानसिकता- 1


Friday, April 20, 2018

ग़ज़ल

हिंदू पढ़िए तो कभी मुसलमान पढ़िए
फेसबुक पर मचा ये कोहराम पढ़िए...

औरों को नीचा दिखाने की होड़ में
ऐसी भद्दी गालियाँ न सरेआम पढ़िए...

पहचानिये मज़हब के इन ठेकेदारों को 
किसने सर पे उठा रखा है आसमान पढ़िए..

दोष दूसरों को देना बहुत आसान है
एक बार पहले अपना गिरेबान पढ़िए...

आग में घी नहीं, ज़ख्म को मरहम दीजिए
जहाँ कहीं हो आप अमन के कलाम पढ़िए...

#हीरेंद्र

सेक्स क्रान्ति बनाम रेप की मानसिकता- हीरेंद्र झा

रेप की ख़बरें तब से भयावह लगने लगी है, जबसे रेप का मतलब समझ में आया. मेरी एक दोस्त ने मुझे बताया था कि एक बार जब वो चौदह साल की थी तो उसके एक रिश्तेदार ने जो उसकी पिता की उम्र का था उसे छत पर अकेला पाकर उसके देह को गलत तरीके से छुआ था. उसने आगे बताया कि तब उसे बिल्कुल भी अहसास नहीं था कि उसके साथ क्या हो रहा है पर वो आज बीस साल बाद भी उन पलों को याद कर सिहर उठती है. जब एक ‘बैड टच’ का इतना गहरा असर है तो सोचिये रेप के वक्त किसी लड़की/बच्ची/महिला/ की क्या हालत होती होगी?



वो असहनीय दर्द, वो बेबसी, वो दुर्गंध, वो जबर्दस्ती...शब्दों में बयां कोई क्या कर सकेगा? और छोटी-छोटी बच्चियों से जब रेप की ख़बरें आती हैं तो रूह तक कांप जाती है. उस दरिंदे की मानसिकता का अंदाज़ा कोई कैसे लगा सकता है? एक बच्ची जिसकी आंखों की चमक और मासूमियत आपको सुकून दे रही हो उसको देखकर किसी का हवस कैसे जग जाता होगा? सेक्स के लिए ये कैसा पागलपन है?



क्या पोर्न इसका जिम्मेदार है? या परवरिश में कोई चूक हो रही है? बहुत उलझा हुआ सा है सबकुछ! एक मेरी दोस्त ने बताया कि जब वो गर्ल्स हॉस्टल में रहा करती थी तो एक रात देर तक पढ़ाई करने के बाद जब उसने ताज़ा हवा के लिए खिड़की के बाहर  देखा तो यह देखकर चौंक गयी थी कि कैसे होस्टल का वाचमैन लड़कियों के कमरों की तरफ देख कर मास्टरबेट कर रहा है! दरअसल सेक्स को लेकर यह पागलपन हर तरफ फैला है? रेप के आंकड़े बड़े ही डरावने हैं! गाँव से लेकर शहर, कश्मीर से लेकर कर्नाटक तो हरियाणा से लेकर असम शायद ही इस देश का कोई ऐसा कोना बचा हो जहां मर्दों ने अपनी हवस का नंगा नाच न किया हो? 



कितनी ही दामिनी, गुड़िया और पापा की लाडली बिटिया ऐसी भी हैं जिनके साथ हुए वहशीपने को कभी आवाज़ न मिल सकी! उनकी चुप्पियों ने भी बलात्कारियों को दूसरे और तीसरे शिकार का मौका दिया ही होगा?




सेक्स की बात करें या सेक्स की आनंद की बात करें तो दो एडल्ट लोग पारस्परिक रूप से संबंध बनाते हैं और यह एक नेचुरल क्रिया है. माना कि मैरिटल रेप जैसी बातें भी हम सुनते हैं लेकिन, एक सामान्य आदमी कभी भी अपने पार्टनर के उदास होने, मूड खराब होने के दौरान उसके साथ सेक्स नहीं करता. सेक्स सहमती से ही संभव है, चाहे वो बेमन से ही हो. ऐसे में जो मानसिक रोगी बलात्कार तक कर लेते हैं उनके धधकते हुए जिस्मानी भूख या पागलपन को समझना आसान नहीं? क्योंकि एक स्तर पर गिरने या पहुँचने के बाद ही आप रेपिस्ट हो सकते हैं! रेप के आंकड़े बताने के लिए काफी है कि अपने देश का मर्द किस हद तक गिर गया है.




एक यह भी तर्क है कि लड़की ने ही भड़कीले कपडे पहनकर और अपना क्लीवेज दिखाकर या अंग प्रदर्शन कर रेपिस्ट (मर्द नहीं लिख रहा हूँ) को उकसाया. तो फिर 4 साल की बच्ची या 70 साल की बूढी महिला का रेप क्यों होता है? अगर तर्क यह है कि परिवार से दुश्मनी निकालने के लिए उक्त लड़की का रेप हुआ तो आखिर ऐसा क्यों है कि आपकी मर्दानगी बस इन महिलाओं और लड़कियों पर ही निकलती है? अगर रेप के पीछे कोई यह तर्क दे कि वो रात को अकेली सड़क पर क्या कर रही थी तो उनसे पूछना चाहूँगा कि वो सड़क पर है, किसी जंगल में नहीं और ज़ाहिर है कोई विवशता या आवश्यकता ही होगी तभी वो बेवक्त घर से निकली है! शराब पीने से लेकर खुलकर हंसने तक के तर्क बेईमानी है! क्योंकि किसी की मर्जी के खिलाफ उसको जब गले तक नहीं लगा सकते आप तो रेप कैसे कर सकते हैं?



कानून क्या कर रहा है? पैसा और पावर जिसके पास है वो सुरक्षित हैं, रेपिस्ट अगर नाबालिग है तो उसके लिए अलग कानून! आंकड़े बताते हैं कि रेप में अगर 20 प्रतिशत केस दर्ज होते हैं तो सज़ा सिर्फ 2 प्रतिशत लोगों को ही मिल पाता है. न्याय की तो बात ही मत कीजिये, न्याय इस देश में अब इतिहास की बात है. आँखों पर पट्टी बांधे कानून की तराजू उठाये उस मूर्ति को म्युजियम में रख दीजिये! ‘सत्यमेव जयते’ लिखने वाले और मानने वाले कब के इस दुनिया को अलविदा कह चुके.



बेटियों पर दुनिया भर की पाबंदियां, बेटों को हर कुछ करने की छूट. बेटों के स्कूल से लौटने पर चूल्हे पर गर्म गर्म सिकतीं रोटियां तो बेटियाँ ठंडा भी खा लेंगी! खुद मां-बाप तक जब बेटी और बेटे में फर्क करे तो उस समाज का चेहरा ऐसा ही विकृत होगा जैसा आज आपको दिख रहा है. ज़ाहिर है अपवाद होंगे पर वो मिसाल नहीं बनते!




हाल ही में एक दिन मैं शनिवार को अपने घर के पास समंदर किनारे यूँ ही घूमने को जा रहा था. मैं ऑटो में था. अक्सा बीच का इलाका थोड़ा सुनसान सा है. तभी मेरी नज़र साथ चल रही गाड़ी पर गयी! जिसे एक जेंट्स ड्राइव कर रहा था, एक महिला उसके बगल में बैठी थी. पीछे की सीट पर दो बच्चे थे. मुश्किल से दोनों बच्चों की उम्र नौ या दस साल की रही होगी. मैं यह देखकर दंग रह गया कि दोनों बच्चे सीट के पीछे छुपकर एक दूसरे को किस कर रहे हैं, जिस तरह से उन दोनों बच्चों के होंठ एक दूसरे से मिले हुए थे यह देखकर मैं भीतर तक हिल गया! हो सकता है वो भाई-बहन हो? या फिर दोनों के पेरेंट्स आपस में दोस्त या रिश्तेदार हो, लेकिन, बड़ा सवाल है इन बच्चों को यह सीख कहां से मिली? 



बहुत सोचा तो लगा कि हो सकता है इन्होने अपने मां और बाप को सेक्स करते या कुछ यूँ करते देखा होगा, या शायद फ़िल्मों का असर हो ये? यानी ट्रेनिंग जो है, बुनियाद जो है वहीं गड़बड़ है! मुझे याद है साल 2007 में एक अंग्रेजी अखबार ने एक बड़ा सर्वे किया था जिसमें उन्होंने बताया कि दिल्ली के स्कूलों में 12 वीं पास करते-करते 90 प्रतिशत लड़कियां अपनी वर्जिनिटी (कौमार्य) खो देती हैं. हालांकि, यह रेप से इतर एक बात है लेकिन, यह आंकड़ा यह बताने के लिए काफी है कि सेक्स के लिए किस हद तक पागलपन है इस देश के डी एन ए में! जब मैं ‘आधी आबादी’ पत्रिका का सहायक संपादक था तो मैंने एक बड़ा लेख लिखा था –भारत सेक्स क्रांति की ओर.. मैं वह लेख भी खोज कर शेयर करूँगा! 



बहरहाल, परवरिश और शिक्षा में जो बिखराव/भटकाव है उस आग में ईंधन देने का काम मीडिया, सिनेमा, अश्लील साइट्स सब लगातार कर रहे हैं! इतनी भीड़ है इस देश में कि एक प्रतिशत लोग भी बलात्कारी निकल गए तो यह आंकड़ा लाखों में होगा. और एक लाख बलात्कारी जिस देश में रह रहा हो उसे आप क्या कहेंगे – बलात्कारियों का देश..है न? इसके अलावा भीड़ में, बाज़ार में, ट्रेन में, बस में, मेट्रो में, गलियों में, सड़कों पर जिसे भी जहां मौका मिल रहा है वो अपनी कुंठाओं को भोग रहा है?






(यह लेख मैं जारी रखूँगा. मैं चाहता हूँ इस पर विस्तार से लिखूं और किसी समाधान तक पहुँचने की कोशिश करूँ)  



Wednesday, April 18, 2018

गुड़गांव बना गुरूग्राम #पहली वर्षगांठ

वो गुड़गांव ही रहती थी। अक्सर उसे उसके घर तक छोड़ने जाता। उन दिनों मेट्रो वहाँ तक नहीं जाती थी तो हम आईआईटी गेट या धौला कुआँ से कैब पकड़ा करते। जब उसे छोड़ कर अकेला लौट रहा होता तो लगता एक मन जैसे वहीं छोड़ आया हूँ। फिर ये सिलसिला धीरे-धीरे कम हो गया और ख़त्म भी। लेकिन, मेरे भीतर एक गुड़गांव हमेशा ज़िंदा रहा है। सुना है कि अब वो शहर 'गुरुग्राम' के नाम से जाना जाएगा। क्या फर्क पड़ता है? जिस नाम से पुकार लो पर कुछ चीज़ें चाह कर भी नहीं बदली जा सकतीं। खैर, उसे आख़िरी बार टीवी पर ही कलाम साहब के जनाज़े के पास देखा था... उस दिन भी वो उतनी ही खूबसूरत लगी थी। वो शहर भी हमेशा खूबसूरत बना रहे। आमीन। #हीरेंद्र

हीरेंद्र की गुगली यानी मस्ती का डोज़!

इस हिस्से में पढ़िये कुछ ऐसी ही दिलचस्प गुगली. क्योंकि आखिरी पंक्ति में आप जान पायेंगे कि आखिर बात किसकी हो रही थी!  #गुगली 1 पिछले सात ...