Sunday, September 23, 2018

बचपन को समझें

चढ़ गया ऊपर रे, अटरिया पे लोटन कबूतर रे!! सरकाय लियो खटिया जाड़ा लगे, सैयां के साथ मडैया में, बड़ा मजा आया रजैया में, चोली के पीछे क्या है ...

जब मैं आठ, दस, बारह साल का था तो इसी तरह के गाने सुनता हुआ बड़ा हो रहा था. उस दौर में ऐसी ही फिल्में और गाने बना करते. कुल्फी वाला ठेले पर चोंगा लगाये यही सब बजाता घुमा करता. या फिर कहीं सरस्वती पूजा या विश्वकर्मा पूजा या ऐसे ही किसी अवसर पर ये गीत सुनने को मिलते. शायद यही वजह रही होगी कि मैं कभी हिंदी फिल्मों के गीतों से एक दीवाने की तरह न जुड पाया. जब अक्ल बढ़ी और साधन सहज हुए तब गीतों को नए सिरे से चुन-चुन कर सुना, जाना, पसंद भी किया. उसी दौर में हमारे अविभाजित बिहार के मुख्यमंत्री एक घटिया प्रसाद यादव हुआ करते थे. बिहार दिनों दिन गर्त में जा रहा था. हर तरफ एक निराशा और दहशत का माहौल था. बाबरी मस्जिद का टूटना भी याद है. नौ साल का था तब. मसलन ये कि उस दौर की राजनीति, फिल्मों और समाज ने एक बढ़ते हुए बच्चे को भटकाने की पूरी कोशिश की लेकिन वो बच्चा उन सबसे लड़ते हुए थोड़ा बहुत बचा रह गया. कहीं न कहीं एक ऐसा समाज हमें मिला जो घोर रूप से जातिवादी, भौतिकवादी और भ्रष्ट रहा है. इसका असर हमारे व्यक्तित्व पर भी पड़ा ही होगा. आज मैं तय कर पाता हूँ, गलत क्या था और सही क्या. पर आठ, दस साल की उम्र में कहाँ इतनी  समझ थी. बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ इस विषय पर. लिखूंगा भी. आज बस ये कहना है कि बच्चों को समझिए, उनके साथ वक्त गुजारिये. वो आपको किताबों के पन्ने पलटते हुए देख सकें, वो आपको खुल कर हँसते हुए देख सकें, आपको गाते-गुनगुनाते देख सकें, आपका आत्मविश्वास, आपकी नरमी, आपकी संवेदना उन्हें  छू पाए...तभी, सिर्फ तभी आप बचा पाएंगे इस समाज को, दुनिया को, बचपन को!! उन्हें हर तरह की फिल्में दिखाइए, किताबें दीजिए. नम्बर लाने के दवाब से मुक्त रखिए. ज़िन्दगी को पढ़ना ज्यादा ज़रुरी है. सपने देखने का हौसला दीजिए वगैरह, वगैरह...चार दिन बाद आज थोड़ी फुर्सत मिली तो सोचा कुछ बात की जाए, आप सबसे. #आज इतना ही

#हीरेंद्र

Tuesday, May 22, 2018

छोटी कविता

जनता जो भीड़ है
भीड़ जो गुम है..
गुम बोले तो बेबस
बेबसी यानी घुटन
घुटन बोले तो अंत
अंत तो मौत है

भीड़ ने एक चेहरा चुना
चेहरे पर एक पहरा चुना
पहरेदार जो क़ातिल है
क़ातिल जो शातिर है
क्या शातिर का अंत होगा?
अंत में तो जनता है..

जनता जो भीड़ है
भीड़ जो गुम है #हीरेंद्र

Saturday, May 12, 2018

मदर्स डे पर एक जरूरी बात


माँ बनने के अहसास को साहित्य और संस्कार ने बड़ा ही खूबसूरत बताया है. जरूरी नहीं कि आप इससे सहमत हो पर एक बड़ी आबादी इस बात को स्वीकार कर चुकी है. आज मैं कविता, कहानी या तस्वीर नहीं लगा रहा हूँ.. बल्कि एक बेसिक से सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश में यह पोस्ट लिख रहा हूँ.

बात मातृत्व सुख की हो रही थी. हाल के वर्षों में मैंने अपने दोस्तों और परिजनों के बीच एक चिंताजनक बात नोटिस की है. मैंने अनुभव किया है कि तीस की उम्र के बाद अधिकाँश लड़कियों को माँ बनने में दिक्कत हो रही है. पैंतीस की उम्र तक पहुंचते पहुंचते तो उनकी बेचैनी इतनी बढ़ जाती है कि वे अवसाद में भी चली जाती हैं. वो जहां जाती हैं बस उनसे यही सवाल पुछा जाता है कि- गुड न्यूज़ कब दे रही हो? जोड़ता चलूँ कि समाज बदला ज़रूर है लेकिन, आज भी किसी औरत का बाँझ होना उसे हीन ग्रंथी से भर देता है!

जब मैंने इंटरनेट पर इस विषय में कुछ लेख खंगाले तो जाना कि आज की लाइफस्टाइल  का असर माँ और पिता बनने की क्षमता पर भी हुआ है. यह भी पढ़ा कि अगर 30,32 की उम्र तक गर्भ धारण न किया जाये तो आगे मुश्किल आती है. यह भी पढ़ा कि दुनिया की 95 प्रतिशत स्त्री तीस से पहले ही मां बन जाती हैं.

बहरहाल, जब मैं समाधान की तरफ गया तो पाया कि अनुशासित जीवन शैली, संतुलित आहार, व्यायाम आदि के जरिये हम यह सुख तीस के बाद भी पा सकते हैं. लेकिन, आज हम सब अपने हेल्थ को लेकर कितने सचेत हैं यह आप खुद तय कर लीजिये.

समय की मांग यह भी है कि कई बार पति-पत्नी दोनों ही नौकरी कर रहे होते हैं. ऐसे में कई बार बच्चे की ज़रूरत को कुछ वर्षों के लिए टाल भी दिया जाता है. और जब वे बच्चे की सोचते हैं तब उन्हें लंबा समय लग जाता है! बॉलीवुड में या कुछ कोर्पोरेट इंडस्ट्री में सरोगेसी का चलन इसलिए भी बढ़ता जा रहा है! आम आदमी सरोगेसी या ऐसी तकनीक से अभी बहुत दूर है. हां किसी बच्चे को गोद लेना भी एक अच्छा विकल्प है! इन सवालों के बीच मैं इस बात से भी सहमत हूँ कि माँ बनना या नहीं बनना आपकी अपनी च्वाइस है.. लेकिन,  जानकारी तो जरूरी है न?  #हैप्पी मदर्स डे #हीरेंद्र

Friday, May 11, 2018

पिताजी का फोन आया!

मोबाइल मेरा मुस्कुराया
पिताजी का फोन आया..

मुझसे पहले ही बोल बैठे
जुग जुग जियो मेरे प्यारे बेटे
और बताओ क्या ख़बर है
कैसा मौसम, कैसा मन है?

हमने सब बढ़िया बताया..
पिताजी का फोन आया..

उम्र 80 पार हैं वो
ज़िंदगी का सार हैं वो
आवाज़ में अब भी रवानी
पास उनके कई कहानी

बुझा सा मेरा मन हर्षाया
पिताजी का फोन आया..

मन मेरा बचपन में लौटा
मेरा अंबर उनका काँधा
संग में जाता जिस भी रस्ते
बाँहे पसारे लोग मिलते

भीतर तक सब है समाया
पिताजी का फोन आया..

दूर हूँ मन में न लाना
तेरा दिल ही है ठिकाना
माँ बहुत है याद करती
जब समय हो मिलने आना..

और सुनाओ क्या खाया?
पिताजी का फोन आया
पिताजी का फोन आया! #हीरेंद्र

Thursday, May 10, 2018

गीतकार कैफ़ी आज़मी को जानिये उनकी बेटी शबाना आज़मी की ज़ुबानी

हीरेंद्र झा, मुंबई। 10 मई को सुनहरे दौर के मशहूर शायर और गीतकार कैफ़ी आज़मी साहब की पुण्यतिथि है। हाल ही में जागरण डॉट कॉम से एक ख़ास बातचीत में उनकी बेटी और दिग्गज अभिनेत्री शबाना आज़मी ने अपने पिता कैफ़ी से जुड़े कई दिलचस्प किस्से साझा किए। क्या आप जानते हैं 'मकान' जैसी लोकप्रिय नज़्म लिखने वाले कैफ़ी साहब ज़िंदगी भर किराये के मकान में ही रहे, वो कभी अपने लिए एक घर नहीं खरीद सके। 

बीसवीं सदी के महानतम शायरों और गीतकारों में से एक कैफ़ी आज़मी अपने आप में एक व्यक्ति न होकर एक संस्था थे। उनकी रचनाओं में हमारा समय और समाज अपनी तमाम खूबसूरती और कुरूपताओं के साथ नज़र आता है। पर क्या आप जानते हैं कलम के इस जादूगर को अपने कलमों से बेहद प्यार था? इस बारे में शबाना बताती हैं कि- ''अब्बा के पास कोई और पूंजी नहीं थी, सिवाय उनके कलमों के। उन्हें अलग-अलग तरह की कलमें जमा करने का शौक था। 'मोर्बलांग' पेन उनका फेवरेट था। वो अपने पेन को ठीक कराने के लिए विशेष रूप से न्यूयॉर्क के फाउंटेन पेन हॉस्पिटल भेजते थे और वो बड़े प्यार से अपने कलमों को रखते थे। बीच-बीच में उन्हें निकाल कर, पोंछ कर फिर रख देते। मैं जहां भी जाती उनके लिए कलम ज़रूर लाती। हर बार उनको कलम ही चाहिए होता। कलमों के प्रति कमाल की दीवानगी थी उनमें।"




शबाना आगे कहती हैं कि- "कैफ़ी आज़मी एक ख़ास तरह के कागज़ पर अपने फेवरेट कलम से लिखते थे। उनका राइटिंग टेबल भी ख़ास तरह का हुआ करता। लेकिन, अब्बा की एक आदत थी। जब भी कुछ लिख कर भेजने की डेडलाइन होती तो उस दिन उन्हें सबसे ज्यादा चिंता अपने कमरे और टेबल की साफ़-सफाई की होती। वो अपना दराज़ साफ़ करते, तभी उनको याद आता कि कई ख़त के जवाब भी उन्होंने नहीं दिए। तो वो हर उस काम में लग जाते जो उस वक़्त गैर-ज़रूरी होता। लेकिन, सच तो यही था कि ये उनके रचनात्मकता का ही एक हिस्सा था। उनके ज़ेहन में उस विषय पर चीजें चलती रहतीं और साफ़-सफाई करते हुए ही वो गीत रच लिया करते।"


शबाना अब्बा को याद करते हुए कहती हैं कि- "उनके कमरे का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता। हमारे घर में कभी कोई रोक-टोक नहीं हुआ करती कि अब्बा लिख रहे हैं तो उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना। हम बेधड़क उनके कमरे में चले जाते और वो बड़े प्यार से हमारे हर तरह के फ़िज़ूल सवालों का जवाब दिया करते।" शबाना के मुताबिक- जब भी कैफी साहब कुछ लिखते तो ये नहीं कहते कि ये लिखा सुनोगी, वो हमेशा कहते कि एक नज़्म हुआ है सुनोगी? जैसे वो कुछ नहीं लिखते बल्कि कोई अदृश्य ताकत है जो उनसे ये सब लिखवाती है। प्रोग्रेसिव राइटर्स के अगुआ लोगों में रहे कैफी के बारे में शबाना ने बताया कि उनके कथनी और करनी में कभी कोई अंतर नहीं रहा। अगर वो महिलाओं के हक की बात लिखते थे तो वो घर-परिवार, समाज की महिलाओं को भी बराबरी का दर्ज़ा देते थे।

शबाना कहती हैं कि अपने जीवन के अंतिम दिनों में कैफी साहब को जब ब्रेन हेमरेज के बाद पैरालिसिस अटैक हुआ तो उन्होंने अपने गांव मिज़वां जाने की इच्छा जताई। उस गांव में जहां सड़कें नहीं थीं, बिजली नहीं था, औरतों की स्थिति काफी दयनीय थी तो वहां भी वो चुप नहीं बैठे। मिजवां में उन्होंने उन सबके हक़ में इसी नाम से एक एनजीओ शुरू किया और तब जब उस गांव का नाम तक लोग नहीं जानते थे आज उसे सब जानते हैं, वहां चीज़ें धीरे-धीरे बदलनी शुरू हुईं। जो कैफ़ी आज़मी जीवन भर अपने लिए एक घर नहीं बना सके उन्होंने कई घरों में रौशनी पहुंचाने का काम किया।
बता दें कि गीतकार के रूप में कैफी आज़मी की कुछ प्रमुख फ़िल्में हैं - शमा, गरम हवा, शोला और शबनम, कागज़ के फूल, आख़िरी ख़त, हकीकत, रज़िया सुल्तान, नौनिहाल, सात हिंदुस्तानी, अनुपमा, कोहरा, हिंदुस्तान की क़सम, पाक़ीज़ा, हीर रांझा, उसकी कहानी, सत्यकाम, हंसते ज़ख्म, अनोखी रात, बावर्ची, अर्थ, फिर तेरी कहानी याद आई..आदि।
बता दें कि यह लेख मूल रूप से दैनिक जागरण की न्यूज़ वेबसाइट जागरण डॉट कॉम पर प्रकाशित हुई है! 

Tuesday, May 08, 2018

'परफ्यूम'

इस हिस्से में पढ़िये एक छोटी सी कहानी- 'परफ्यूम'

आज लिफ्ट में एक लड़की मिली. बहुत आम बात है. लेकिन, ख़ास बात ये थी कि जो परफ्यूम उसने लगा रखी थी उसकी सुगंध मुझे जानी-पहचानी लगी. मैंने बिना देरी किये उससे उसके परफ्यूम का नाम पूछ लिया! पहले तो वो थोड़ी झिझकी फिर स्माइल करते हुए उसने अपने परफ्यूम का नाम बता ही दिया. थैंक्यू कह कर मैं लिफ्ट से निकला फिर फोन बुक से खोज कर एक नंबर निकाला..एक पुरानी दोस्त को फोन मिलाया और कहा- एक बात कहूं, तुम्हारी गंध मुझे अब भी याद है! उसने बड़ी ही मासूमियत से पूछा- और मैं? उसके बाद फोन का नेटवर्क चला गया और परफ्यूम की वो खुशबू भी!  #हीरेंद्र


अब आये हैं ब्लॉग पर तो कुछ प्रेमपत्र भी पढ़ते जाइए. ये प्रेम पत्र मैंने किसी प्रेमिका के नाम नहीं बल्कि समय ने जीवन के नाम लिखे हैं!

यह रहा लिंक:  प्रेमपत्र (लवलेटर)