Thursday, April 17, 2014

आदमी

पेश है निदा फाजली की प्रसिद्ध ग़ज़ल ' आदमी' 

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी,
फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी,

सुबह से शाम तक बोझ ढ़ोता हुआ,
 अपनी लाश का खुद मज़ार आदमी,

 हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते,
 हर तरफ आदमी का शिकार आदमी,

 रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ,
 हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी,

 जिन्दगी का मुक्कदर सफ़र दर सफ़र,
 आखिरी साँस तक बेकरार आदमी


Wednesday, April 16, 2014

ये राजनीति भी बड़ी फ़िल्मी है…


नेता और अभिनेता समाज के दो अलग-अलग पहलू हैं। दोनों की अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ हैं। दोनों ही अपने समय के समाज को प्रभावित करते हैं लेकिन साथ ही, वे एक दूसरे से प्रभावित भी होते हैं। पुराने समय से ही शासक, सत्ता, राजनीतिक संगठन और समाज के प्रभुत्वशाली वर्ग अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए कलाकारों का इस्तेमाल करते रहे हैं। कलाकार कभी अपनी इच्छा से, कभी दबाव में तो कभी स्वार्थ के कारण इस्तेमाल होते रहे हैं। फिर भी नेता और अभिनेता की सामाजिक भूमिका में फ़र्क मौजूद रहा है और रहना भी चाहिए। कोई अभिनेता समाज की परेशानियों को समझते हुए एक निश्चित सोच-विचार के साथ सामाजिक कार्य कर सकता है, किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो सकता है और उसके लिए प्रचार भी कर सकता है।
मौजूदा लोकसभा के सांसदों में 6 फिल्मी कलाकार और एक फिल्म प्रोड्यूसर हैं। किरण खेर, हेमा मालिनी, गुलपनाग, परेश रावल, रवि किशन, मनोज तिवारी, राखी सावंत, बप्पी लहरी, मुनमुन सेन, राज बब्बर, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे 25 से ज्यादा फिल्मी लोग इस बार लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार का रोल निभा रहे हैं।
राखी सावंत को टिकट नहीं मिला तो खुद की पार्टी बना ली। टीवी पर समाजसेवा की बड़ी-बड़ी बातें कर रही थीं। हरी मिर्ची चुनाव चिह्न मांगा है। पॉलिटिक्स भी फिल्मी हो गई है। अब यही देख लो राहुल गांधी के खिलाफ टीवी वाली तुलसी। जाने क्या होगा इस देश का?
राजनीति एक ऐसा विषय है जिस में आंशिक या पूर्ण दखल हर नागरिक रखता है। आज कल राजनीति का स्वरूप मर्यादाविहीन दिखाई दे रहा है। पॉलिटिकल लोग  जिस भाषा का उपयोग कर रहे हैं, उसका स्तर बहुत ही निम्न होता जा रहा है राजनीतिक पार्टियों एक नया तरीका अपना रही  है और वह है मुद्दों पर राजनीति कम शाब्दिक और व्यक्तिगत हमलों पर ज्यादा से ज्यादा राजनीति करना  उन्हें तो जनहित आधारित मुद्दों की फिक्र है और ही देश की। एक पार्टी ने सत्ता में रहते हुए अगर बुरे काम किए हैं तो दूसरी पार्टी देश की जनता को असलियत से रुबरु करने की बजाय  सड़कछाप शब्दावली के जरिये एक-दूसरे पर वार कर रही हैं।  कभी  कोई किसी  को गुंडा बताता  है तो कोई किसी को दरिंदा,  कहीं  ज़हर की खेती की बात हो रही है तो कहीं किसी को पाकिस्तानी एजेंट बताया जा रहा है। इन नेताओं की भाषा सुनकर गली के लफंगे भी शर्मिदा हो रहे हैं  ऎसा क्यों हो रहा है? क्या मजबूरियां हैं ? उनका उद्देश्य क्या है?
इन्हें ये समझना चाहिए किराजनीतिक भाषा उपहास का साधन नहीं है। राजनीति एक ठिठोलेपन जैसी क्रिया भी नहीं है। राजनीति एक गंभीर विषय है और उसकी जड़ प्रजातंत्र में है इसलिए यह जरुरी है कि राजनीतिक भाषा और समाज के बीच में सामंजस्य बनाए रखा जाए।
बयानबाजी के इस दौर में वैसे ये देखना सुखद है कि जो फ़िल्मी अभिनेता या अभिनेत्रियां राजनीति में आ रहे हैं उनके संवाद और डायलाग अदायगी खूब सराहे जा रहे हैं!
भारत माता है पीड़ा में, यह भीड़ पीड़ा की मूरत है। नार्थ ईस्ट ललकार रहा, देश पुकार रहा, अब मोदी की जरूरत है। दिल्ली के नार्थ ईस्ट लोकसभा से भाजपा प्रत्याशी मनोज तिवारी प्रचार के दौरान इस गीत के साथ छाए रहे!
एक मुस्लिम युवा रहमान उस्मानपुर में उनसे पूछ लेता है आप तो सपा में थे। तिवारी ने कहा , ना रे भईया हम तो दिल से कभी वहां थे ही नहीं, चुनाव जरूर लड़े थे उसका आज भी मलाल है। कहीं न कहीं फ़िल्मी अंदाज़ में इनके संवाद लोगों को आकर्षित कर ही लेते हैं!
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर आधा दर्जन ऑटो रिक्शा खड़े थे। उनके ऊपर लगे लाउड स्पीकर पर मोहम्मद रफी का मेरे सनम फिल्म का गाना सुनाई दे रहा था। 'पुकारता चला हूं मैं, गली-गली बहार की।।।'। कोई कुछ समझता इससे पहले ही अचानक गाना बीच में रुकता है और एक आवाज सुनाई देती है, 'मैं हूं बिश्वजीत, बॉलीवुड अभिनेता, नई दिल्ली सीट से इस लोकसभा चुनाव में आपका प्रत्याशी।' इतना वाक्य पूरा होते ही फिर से एक नया गाना गूंजने लगता, 'बेकरार करके हमें यूं न जाइए, आपको हमारी कसम लौट आइए ।।।'।
ये नजारा था, तृणमूल के नई दिल्ली सीट से उम्मीदवार बिश्वजीत के रोड शो का। वे जिस भी ओर जाते हैं, उनके साथी अनाउंस करते हैं, 'भाइयो बहनों, आपके बीच बॉलीवुड के सुपरस्टार बिश्वजीत आ चुके हैं। इनकी हिट फिल्में थीं, बीस साल बाद, दो कलियां, मेरे सनम, अप्रैल फूल, नाइट इन लंदन। ये गीत इन्हीं की फिल्मों के हैं। आने वाली 10 अप्रैल को आप घास पर दो फूल का बटन दबाएं।' अधेड़ उम्र के लोग बीच-बीच में आकर उनसे उत्सुकता से हाथ मिलाते।
वाक़ई ये राजनीति भी बहुत फ़िल्मी है! फ़िल्म से राजनीति में गए ऐसे अनेक कलाकार हैं जिनकी ईमानदारी और निष्ठा पर विरोधी पार्टियाँ भी संदेह नहीं कर सकतीं। अपनी सेवा से उन्होंने यह सम्मान हासिल किया है। शत्रुघ्न सिन्हा शुरू से ही विपक्ष के प्रचारक रहे, उन्होंने खुलकर भाजपा का समर्थन किया और मंत्री बनने से पहले संतरी की भूमिका निभाते रहे। और आज वो चाहे कहीं भी राजनितिक प्रचार क्यों न कर रहे हों श्रोता या वोटर उनसे उनका ट्रेड मार्क संवाद खामोश कहने को ज़रूर कहते हैं! दोबारा चुने जाने की चुनौती का सामना कर रहे पटना साहिब से भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा के पक्ष में प्रचार उनकी पुत्री और बालीवुड अदाकारा सोनाक्षी और पत्नी पूनम सहित परिवार के अन्य सदस्य भी कर रहे हैं। अपनी फिल्मों की शूटिंग के दबाव के मद्देनजर समय नहीं मिल पाने के कारण ‘दबंग फिल्म की मशहूर अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा अपने पिता के पक्ष में चुनाव प्रचार के लिए पटना नहीं आ पाने के कारण इसके लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया है।
शत्रुध्न सिन्हा कहते हैं कि मेरी राय में बरसों की मेहनत और दर्शकों से मिले प्यार से बनी लोकप्रिय छवि का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए। जब कोई नेता किसी फिल्मी कलाकार को नचैया-गवैया कहकर संबोधित करता है तो मुझ जैसे कलाकार के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है। इतनी मेहनत से हासिल सम्मान को हम एक झटके में खो देते हैं। वैसे भी, चुनाव प्रचार में कलाकारों की भूमिका क्या होती है? भीड़ जुटाना, किसी बड़े नेता के भाषण के पहले श्रोताओं का ध्यान खींचना या दो नेताओं के भाषण के बीच मौजूद भीड़ को बाँधे रखना। क्या राजनीति में इसी योगदान के योग्य हैं हम? साथी कलाकारों से मेरा निवेदन है कि खुद को इतना नीचे न गिराएँ। हाँ, अगर समाज की परेशानियाँ उद्वेलित करती हैं, किसी राजनीतिक पार्टी का घोषणापत्र उचित लगता है या अपने राजनीतिक योगदान के प्रति गंभीर हैं तो अवश्य जाएँ।
वहीँ भाजपा की नेता हेमामालिनी अपने चुनावी रणक्षेत्र यानी मथुरा लोकसभा में भारी गर्मी के बावजूद पूरे मन से प्रचार में जुटी हैं और वे भी जहाँ जाती हैं तो शोले के कुछ डायलाग खासकर बसंती के अंदाज़ देखने-सुनने की डिमांड पब्लिक कर ही देती है।

फ़िल्मी कलाकारों की फेहरिस्त लम्बी है और उनके चाहने वालों की भी, साथ ही उनके फ़िल्मी करियर के कुछ संवादों की डिमांड भी! आखिर कहीं न कहीं फ़िल्मी कलाकारों का मतलब मनोरंजन से जोड़ कर देखा जाता रहा है इसलिए राजनीति के मंच से भी दर्शक उनसे वही अपेक्षा रखता है जो वे फ़िल्मी परदे पर देखते-सुनते आये हैं। इसलिए भी ये कहना मुनासिब ही होगा की ये राजनीति भी बड़ी फ़िल्मी है!

Friday, April 11, 2014

आओ न कुछ बात करें

"आओ न कुछ बात करें..बातों से फिर बात चले...
उसकी और हमारी बातें.. थोड़ी गुदगुदाती और प्यारी बातें..
खूब सारी बातें..
इतनी बातें कि हो जाये, हम दोनों की आभारी बातें..
कुछ तुम कहो लखनऊ की, कुछ हम करें बिहारी बातें..
निभाए हमसे यारी बातें..
क्यों मौन रहे, मिश्री घोले..हमारी ख़ामोशी भी बोले..
दिन रैन रहे ज़ारी बातें..थोड़ी मोटी और गाढ़ी बातें..
तुझ पर जाये वारी बातें..
आओ न कुछ बात करें..बातों से फिर बात चले..." - तुम्हारा ही हिरेन्द्र 



Friday, April 04, 2014

अभिनेता जब बने नेता

सिनेमा मतलब ग्लैमर. ग्लैमर मतलब लोकप्रियता.  और लोकप्रियता कहीं कहीं राजनीति की पहली शर्त है! आज हम कुछ ऐसे फ़िल्मी कलाकारों की बात करेंगे जो अभिनेता से नेता बने! कुछ सफल भी हुए तो कुछ को ये बदलाव भाया नहीं! कहीं कहीं सिनेमा का इतिहास जितना पुराना है उतना ही पुराना है सिनेमाई  लोगों का राजनीति में आने का इतिहास. 





यहाँ बात हम उन नेताओं की करेंगे जिन्होंने चुनाव लड़ा क्योंकि अगर सबका ज़िक्र किया जाए तो  फिर यह लेख सिर्फ नामों से ही भर जाएगा! देविका रानी, पृथ्वी राजकपूर, लता मंगेशकर से लेकर आज रेखा तक राज्य सभा सदस्य रहे हैं इसलिए हम आपकी सुविधा के लिए राज्यसभा में मनोनीत सदस्यों की चर्चा नहीं कर रहे

राजनीति की असली चुनौती है इलेक्शन, जहाँ आपको एक तय संख्या चाहिए होता है सरकार बनाने के लिए! ऐसे में चुनावी मैदान में जीत की अहमियत बहुत ही बढ़ जाती है! सभी पार्टियां इस मौके में रहती हैंकि उन्हें कोई ऐसा प्रत्याशी मिले जो लोकप्रिय हो, जिसको छवि समाज में अच्छी हो और ऐसे में ज़ाहिर तौर पर राजनीतिक दलों की नज़र अलग-अलग फील्ड के कामयाब लोगों पर रहती है. अपने देश में सबसे ज्यादा क्रेज अगर किसी चीज़ का है तो वो है सिनेमा. इसलिए भी राजनीति में सिनेमाई लोगों की एंट्री बाकी प्रोफेशन की तुलना में सुलभ है!

फिल्मी सितारों की लोकप्रियता को भुनाने के लिए राजनीतिक पार्टियां कभी उन्हें चुनाव मैदान में उतारती हैं तो कभी स्टार प्रचारक के रूप में. राजनीति का अनुभव होने के बावजूद इन स्टार्स को आसानी से टिकट मिल जाता है, क्योंकि राजनीतिक पार्टियों का मुख्य मकसद स़िर्फ इनके सहारे चुनाव जीतना होता है.

बॉलीवुड कलाकारों की लोकप्रियता को भुनाने की शुरुआत देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने की. पार्टी की जीत के लिए स्टार छवि को भुनाने से उन्हें कोई परहेज नहीं था. 1962 के आम चुनाव में बलरामपुर संसदीय क्षेत्र से खड़े थे लोकप्रिय राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी और उनके अपोजिट एक बेहद आम महिला थी दिल्ली की सुभद्रा जोशी. अटल जी की लोकप्रियता से नेहरू भी वाकिफ थे. तब उन्होंने अटल बिहारी बाजपेयी को मात देने के लिए उस समय के बड़े स्टार बलराज साहनी की मदद ली. बलराज साहनी के जादू के आगे आख़िर अटल बिहारी वाजपेयी हार गएइसके बाद तो सभी पार्टियों में स्टार्स छवी को भुनाने का ट्रेंड चल निकला. जहां स्टार्स रिटायरमेंट के बाद विकल्प के तौर पर राजनीति में आने लगे, वहीं राजनीतिक पार्टियों को भी उनकी बदौलत जीत की उम्मीद नजर आने लगी.

चुनावी सभाओं में राजनीतिक पार्टियों का एजेंडा और उनके वायदे लोग कम देखते हैं और अपने प्रिय कलाकार की एक झलक देख लेने के लिए हुजूम उमड़ पड़ता है. भीड़ इकट्ठी करने के लिए राजनीतिक पार्टियां लोकप्रिय कलाकारों को अपने साथ जोड़ने की होड़ में लगी रहती हैं. वहीं फिल्म कलाकारों को राजनीति में आने के अलग फ़ायदे नज़र आते हैं. अपने जमाने में लोगों के दिलों पर राज करने वाले फिल्म स्टार्स नर्गिस, सुनील दत्त, अमिताभ, रेखा, शबाना आजमी, हेमा मालिनी, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कई कलाकारों ने राजनीति में किस्मत आजमाई. जाने-माने फिल्म कलाकार और राजनेता शत्रुघ्न सिन्हा फिल्म कलाकरों के राजनीति में आने की वजह मानते हैं कि वे लोकप्रिय होने के साथ ही आर्थिक रुप से मज़बूत भी हैं, जिससे पार्टी पर ज़्यादा दबाव नहीं रहता. इसके अलावा, फ़िल्म स्टार्स राजनीति में राजकीय सम्मान पाने की लालसा से आते हैं, जबकि राजनीतिक पार्टियां उनके ज़रिए ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचना चाहती हैं. दोनों ही एक-दूसरे की ज़रुरत को पूरी करते हैं.

हालांकि अधिकतर स्टार्स को सियासी दुनिया रास नहीं आती. भारतीय जनता पार्टी से सांसद रह चुके अभिनेता धर्मेंद्र कहते हैं कि फ़िल्म स्टार्स अगर राजनीति से दूर ही रहें तो अच्छा है. उनकी राय में अभिनेता को अभिनय तक ही रहना चाहिए और राजनीति में नहीं जाना चाहिए. हालांकि उन्हीं के बेटे सन्नी अब बीजेपी में शामिल हो रहे हैं. हम आपको बताते हैं कुछ ऐसे ही कलाकरों के बारे में जिन्होंने बॉलीवुड में करियर ख़त्म होने के बाद राजनीति की राह पकड़ी, लेकिन एक राजनेता के रूप में वह कितने सफल हुए..

सुनील दत्त ने कई बेहतरीन फिल्में की. अभिनेत्री नर्गिस से विवाह कर हिंदू-मुस्लिम एकता की मिशाल कायम की. उनकी लोकप्रियता को देखते हुए कांगे्रस पार्टी ने उन्हें टिकट दी. उन्होंने 1984 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर मुंबई उत्तर पश्चिम लोकसभा सीट से चुनाव जीता और सांसद बने. वे यहां से लगातार पांच बार चुने गए. उनकी गिनती प्रभावशाली नेताओं में होती थी. मृत्यु के बाद उनकी बेटी प्रिया दत्त उनकी विरासत संभाल रही हैं.

वहीं नर्गिस ने फिल्मों को अलविदा कहा और सामाजिक कार्यों में जुट गईं. पति सुनील दत्त के साथ अजंता आर्ट्स कल्चरल ट्रूप की स्थापना भी की. यह दल सीमाओं पर जाकर जवानों के मनोरंजन के लिए स्टेज शो करता था. नर्गिस को उनके योगदान के लिए पद्मश्री सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले. उनके योगदान और लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया.

अमिताभ बच्चन-जया बच्चन : राजीव गांधी के कहने पर अमिताभ ने राजनीति में क़दम रखा था. अभिनय से कुछ दिनों का बे्रक लेकर उन्होंने अपने शहर इलाहाबाद से चुनाव लड़ा. उनके सामने एक बड़ा नाम था एच.एन. बहुगुणा. अमिताभ की लोकप्रियता काम आई और उन्होंने बहुगुणा को भारी अंतर से हराया. सुपरस्टार अमिताभ राजनीति में कुछ ख़ास नहीं कर पाए और उनके दामन पर दाग़ लगे सो अलग. इस छोटे से सफ़र में बोफोर्स कांड में उनके भाई अजिताभ का नाम भी आया. वह जल्द ही समझ गए कि नेतागिरी उनके लिए नहीं है और उन्होंने राजनीति से विदा लेने में ही भलाई समझी. हालांकि सपा से उनकी नजदीकियां थीं. अमर सिंह उनके अच्छे मित्र थे और मददगार भी. अमर सिंह के कहने पर ही जया ने समाजवादी पार्टी ज्वाइन की.

धर्मेंद्र-हेमा मालिनी : फिल्मों में अभिनय के अलावा धर्मेंद्र और हेमा मालिनी ने राजनीति में भी किस्मत आजमाई. वर्ष 2004 में धर्मेंद्र और हेमा दोनों भाजपा में शामिल हुए. भाजपा के टिकट पर धर्मेंद्र ने राजस्थान के बीकानेर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव जीता, लेकिन धर्मेंद्र राजनीति में सक्रिय नहीं रहे. संसद के किसी भी सत्र में वह शामिल नहीं होते थे. इससे उन्हें कई तरह के आरोपों का सामना भी करना पड़ा.

 गोविंदा : गोविंदा कांगे्रस के टिकट पर उत्तरी मुंबई से वर्ष 2004 में सांसद चुने गए थे. बॉलीवुड में कामयाबी के बाद उन्होंने पांच साल का ब्रेक लिया और राजनीति में आए, पर बाद में उन्होंने कहा कि यह फैसला उनके जीवन का सबसे ख़राब ़फैसला था. गोविंदा ने कहा कि उनके लिए यह वाकई चुनौतीपूर्ण था कि वह करिश्मा कपूर और बॉलीवुड की हॉट हसीनाओं के जगह नेताओं के साथ काम करना. और तो और वह यह भी कहते हैं कि राजनीति में रहते उनका वजन ब़ढकर 108 किलोग्राम हो गया था और जब उन्होंने राजनीति छो़डने का फैसला किया तो वजन घटाना उनके लिए मुश्किल हो रहा था. वह यह भी मानते हैं कि राजनीतिक बैकग्राउंड के बिना यहां रहना काफ़ी मुश्किल है, पर वह खुशनसीब मानते हैं ख़ुद को कि बिना उनके दामन पर कोई दाग़ लगे उन्होंने राजनीति से विदाई ले ली.

जया प्रदा : जयाप्रदा को 1994 में उनके पूर्व साथी अभिनेता एन.टी. रामराव ने तेलुगू देशम पार्टी में लाए, पर बाद में उन्होंने एन.टी. रामराव से नाता तोड़ लिया और चंद्रबाबू नायडू गुट में शामिल हो गईं. 1996 में उन्हें आंध्र प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने के लिए राज्यसभा में मनोनीत किया गया. पार्टी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू के साथ मतभेदों के कारण, उन्होंने तेदेपा को छोड़ दिया और समाजवादी पार्टी में शामिल हो गईं. 2004 के आम चुनावों के दौरान रामपुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा और सफल रहीं.

शत्रुघ्न सिन्हा : शत्रुघ्न सिन्हा भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं. वर्ष 1996 में शत्रुघ्न सिन्हा पहली बार राज्य सभा के सदस्य चुने गए. 2002 में उन्हें दोबारा राज्यसभा सदस्य का पद प्रदान किया गया. 2004 में शत्रुघ्न सिन्हा ने अभिनेता शेखर सुमन को हरा कर पटना निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा चुनाव जीता. केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने परिवार कल्याण मंत्रालय और शिपिंग मंत्रालय संभाला. वर्ष 2009 में वह पंद्रहवें लोकसभा चुनाव में भी विजयी रहे और उन्हें पर्यटन, संस्कृति, और यातायात समिति का सदस्य बनाया गया. वह बॉलीवुड छोड़ पूरी तरह से राजनीति में सक्रिय रहे. शत्रुघ्न सिन्हा जय प्रकाश नारायण के अनुयायी माने जाते हैं. शत्रुघ्न सिन्हा ने असहायों के लिए गृह निर्माण और लोगों को नेत्र दान के लिए प्रेरित करने के लिए कई कार्यक्रमों का भी आयोजन किया. इसके अलावा वह दहेज प्रथा और श्रमिकों पर होने वाले अत्याचार को उजागर करने के लिए कालका और बिहारी बाबू नामक सामाजिक फिल्मों का निर्माण भी कर चुके हैं. उत्कृष्ट सामाजिक योगदान के लिए शत्रुघ्न सिन्हा को बिहार रत्न सम्मान से भी नवाजा गया है. संजय दत्त : जेल से रिहा होने के पश्चात संजय दत्त की नजदीकियां समाजवादी पार्टी से बढ़ने लगीं. वर्ष 2009 के आम-चुनावों से पहले उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने की घोषणा की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन पर चल रहे मुक़दमों को स्थगित करने से मना कर दिया, जिसके बाद उन्हें अपना नाम वापस लेना पड़ा.

वैजयंति माला : वर्ष 1989 के चुनाव के दौरान राजीव गांधी ने उन्हें टिकट देकर चुनाव लड़ने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. उन्होंने चुनाव ल़डा और 1.5 लाख वोटों से जीत दर्ज कराई. इसके बाद वह दो बार राज्यसभा से सांसद भी रहीं.

विनोद खन्ना : विनोद खन्ना 1997 भारतीय जनता पार्टी से जुड़े. अगले ही वर्ष पंजाब के गुरदासपुर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद विनोद खन्ना लोकसभा सदस्य बने. 1999 में हुए चुनावों में वह एक बार फिर इस निर्वाचन क्षेत्र से जीते. जुलाई 2002 में विनोद खन्ना को केंद्रीय मंत्री के तौर पर संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय दिया गया. वर्ष 2004 में हुए लोकसभा चुनावों में विनोद खन्ना की जीत हुई, लेकिन 2009 में पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव में विनोद खन्ना नहीं जीत पाए.

चिरंजीवी : तेलुगू सिनेमा के सुपरस्टार चिरंजीवी ने 2008 में प्रजाराज्यम नाम से राजनीतिक पार्टी बनाई थी. इस पार्टी का मुख्य उद्देश्य सामाजिक न्याय दिलाना था. 2009 के चुनाव में आंध्र प्रदेश के स्टेट असेंबली से यह पार्टी जीती थी. 2011 में उनकी पार्टी का विलय कांग्रेस में हो गया.
अमिताभ ने ट्विटर पर अपनी ट्वीट में लिखा है कि उनका मानना है कि राजनीति कोई बुरा व्यवसाय नहीं है.उन्होंने लिखा है कि यदि आप इस क्षेत्र में सफल हो जाते हैं, तो आपको बहुत से पुरस्कार मिल सकते हैं, लेकिन अगर आप खुद को किसी वजह से अपमानित कर लेते हैं, तो आप हमेशा एक किताब लिख सकते हैं. 

समाचार एजेंसी पीटीआई से दिल्ली में बातचीत में धर्मेंद्र ने कहा कि अभिनेता को अभिनय तक ही रहना चाहिए और राजनीति में नहीं जाना चाहिए.
फ़िल्म इंडस्ट्री में अपने 50 साल पूरे कर रहे धर्मेंद कहते हैं," मैं ये नहीं कहूँगा कि राजनीति में आना एक ग़लती थी पर हाँ अभिनेताओं को राजनीति में नहीं आना चाहिए क्योंकि इससे दर्शक बँट जाते हैं. बतौर कलाकार मेरे प्रशंसकों से मुझे जो सम्मान और प्यार मिला है वही मेरी उपलब्धि है."

धर्मेंद्र सासंद है और वे बीकानेर से चुने गए थे लेकिन पिछले कुछ सालों में उन्हें काफ़ी आलोचना झेलनी पड़ी है कि वे संसद में मौजूद नहीं रहते और अपने चुनाव क्षेत्र में भी नहीं जाते.
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि किसी भी क़ीमत पर जीत के जब आप चुनाव मैदान में जाते हैं तो आपको कई ऐसे चेहरे चाहिए जिन्हे जनता पसंद करती हैं. इस खांचे में फ़िल्मी कलाकार आसानी से फिट हो जाते हैं! और भविष्य में भी यह फेहरिस्त काफी लम्बी होने वाली है! कुछ कलाकार फिल्मों से सन्यास लेने के बाद या पीट जाने के बाद भी राजनीति में आते हैं और अपनी फ़िल्मी डायलॉग सुना सुना कर भीड़ भी जुटाते हैं, ज़रूरी नहीं कि यह भीड़ वोट में भी बदले लेकिन सम्भावना तो रहती ही है!