Monday, May 21, 2012

मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा / वसीम बरेलवी

मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा

हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उस से रिश्ता वसीम
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा

Saturday, May 19, 2012

जर्मनी के पस्टोर मार्टीन निमोलर की एक कविता याद आती है, जो उन्होने-"फर्स्ट दे कम " के नाम से लिखी है। 

जब नाज़ी कम्यूनिस्टों के पीछे आए,
मैं खामोश रहा
क्योकि, मैं कम्यूनिस्ट नहीं था
जब उन्होंने सोशल डेमोक्रेट्स को जेल में बंद किया
मैं खामोश रहा
क्योकि, मैं सोशल डेमोक्रेट नहीं था
जब वो यूनियन के मजदूरों के पीछे आए
मैं बिलकुल नहीं बोला
क्योकि, मैं मजदूर यूनियन का सदस्य नहीं था
जब वो यहूदियों के लिए आए
मैं खामोश रहा
क्योकि, मैं यहूदी नहीं था
लेकिन,जब वो मेरे पीछे आए
तब, बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था
क्योंकि मै अकेला था।
दूर जब तुम थे, स्वयं से दूर मैं तब जा रहा था,

पास तुम आए जमाना पास मेरे आ रहा था

तुम न थे तो कर सकी थी प्यार मिट्टी भी न मुझको,

सृष्टि का हर एक कण मुझ में कमी कुछ पा रहा था,

पर तुम्हें पाकर, न अब कुछ शेष है पाना इसी से

मैं तुम्हीं से, बस तुम्हीं से लौ लगाना चाहता हूं।

मैं तुम्हें, केवल तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं॥ 

गोपालदास "नीरज"

Monday, February 27, 2012

ये सच है की तुम्हे मैंने अपनी जिंदगी माना
ये भी सच ही है कि- जिंदगी का कोई भरोसा नहीं!!!
बड़ा विरोधाभाष है...खैर...अपना ख्याल रखना ऐ जिंदगी!!!