Saturday, May 19, 2012

दूर जब तुम थे, स्वयं से दूर मैं तब जा रहा था,

पास तुम आए जमाना पास मेरे आ रहा था

तुम न थे तो कर सकी थी प्यार मिट्टी भी न मुझको,

सृष्टि का हर एक कण मुझ में कमी कुछ पा रहा था,

पर तुम्हें पाकर, न अब कुछ शेष है पाना इसी से

मैं तुम्हीं से, बस तुम्हीं से लौ लगाना चाहता हूं।

मैं तुम्हें, केवल तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं॥ 

गोपालदास "नीरज"

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